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किसान संगठनों का “काठमांडू घोषणापत्र” / "खाद्य संप्रभुता और किसान अधिकार" पर नेपाल में अंतर्राष्ट्रीय किसान सम्मलेन
July 24, 2019 • Purushottam Sharma

किसान संगठनों का “काठमांडू घोषणापत्र”

(11 मार्च 2019, काठमांडू, नेपाल)

किसानों, भूमिहीन किसानों और खेत मजदूरों, खाद्य एवं विभिन्न कृषि उत्पादकों के छोटे उत्पादकों, युवा एवं महिला किसानों, मछुआरों, पशुधन धारकों एवं पशु चारकों, कृषि सहकारिताओं, जैविक उत्पादकों, दलितों और आदिवासियों, कृषि विशेषज्ञों, किसान संगठनों एवं मोर्चों, समुदाय आधारित संगठनों, नागरिक संगठनों, नेपाल के किसान आयोग और नेपाल सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के प्रतिनिधियों और बांग्लादेश, उत्तर कोरिया, भारत, इन्डोनेशिया, मलेशिया, पाकिस्तान, फिलीपींस श्रीलंका, एशिया भर से “खाद्य संप्रभुता और किसानों के अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन” में 10-12 मार्च 2019 तक यहाँ काठमांडू में एकत्रित हम 350 प्रतिनिधिगण अपनी सरकारों, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, अंतर-सरकारी संगठनों और संबन्धित प्राधिकारियों का आह्वान करते हैं कि वे खाद्य संप्रभुता और किसान अधिकारों को सुनिश्चित करें.

यह सम्मेलन नेपाल के राष्ट्रीय किसान आयोग (एन.एफ.सी) द्वारा आयोजित किया गया. एन.एफ.सी. किसानों के अधिकारों की रक्षा करने और उन्हें प्रोत्साहित करने वाला सरकारी संस्थान है. ज्ञान, विशेषज्ञता और किसानों के मुद्दों, विशेष तौर पर खेतिहरों के अधिकारों और खाद्य सुरक्षा के मामले में विभिन्न देशों से आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना और भविष्य के सहयोग, संघर्ष तथा नीतिगत हस्तक्षेप के लिए संभावनाएं तलाशना, इस सम्मेलन का उद्देश्य है.

एशिया में दुनिया के किसानों और भूमिहीन खेत मजदूरों की बड़ी आबादी निवास करती है. खाद्य, ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और जलवायु के हिसाब से एशिया की किसानी सर्वाधिक गंभीर और भयावह संकट के दौर से गुजर रही है और वैश्विक नवउदारवादी नीतियां इस संकट की जनक हैं. हम इस महाद्वीप में गहरे पैठी भूख, गरीबी और कुपोषण से भिज्ञ हैं और हम इसके ढांचागत कारणों को भी जानते हैं. कृषि संकट, जमीन एवं जल निकायों पर कब्जा, कॉरपोरेट खेती, रासायनिक खेती, जी.एम. बीजों के उपयोग, कृषि भूमि का बंटवारा और क्षरण, बाज़ारों का उदारीकरण कृषि क्षेत्र में सेवाओं और निवेश के भयावह रूप से हम सशंकित हैं. हम कृषि  अनुदानों और घरेलू सहयोग में कटौती से चिंतित हैं जो किसानों के लिए बेहद नुकसानदेह सिद्ध हुआ है. प्राकृतिक और उत्पादक संसाधनों, जैसे जमीन, जल, जंगल बीज आदि तक सीमित पहुँच और कृषि बाजार, वित्त, किसान पक्षधर तकनीकों तक खराब पहुँच, कृषि के रूपान्तरण और कृषकों की समृद्धि के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियां हैं. हम खेती में रसायनिकों खादों के अत्याधिक इस्तेमाल को लेकार भी चिंतित हैं क्यूंकि यह मानव स्वास्थ्य और परिस्थिकीय तंत्र के लिये घातक है. 

इस कठिन संकट की घड़ी में खाद्य संप्रभुता और किसानों के अधिकारों को बचाने के लिए किसानों के सशक्त प्रतिरोधों को खड़ा करने की तत्काल आवश्यकता है. हम इस बात पर ज़ोर देना चाहते हैं कि खाद्य संप्रभुता सभी लोगों का मौलिक अधिकार है और समाजों को नीतियों के जरिये खाद्य और कृषि तंत्रों को नियंत्रित करना चाहिए ताकि हर किसी को वाजिब कीमत पर, पर्याप्त, पौष्टिक और सांस्कृतिक रूप से उचित भोजन प्राप्त हो सके. न केवल परंपरागत ज्ञान और कृषि के दीर्घकालीन तौर-तरीकों को नष्ट कर दिया गया है, बल्कि बीज और कई अन्य संसाधन भी कुछ कंपनियों और अभिजनों के हाथों में सीमित कर दिए गये हैं.

इसलिए हम कृषि-परिस्थितिकी का पक्षपोषण करते हैं, अपने ग्रह को ठंडा करने का प्रयास करते हैं और अपनी मिट्टी और बीजों का संरक्षण करते हैं. हमारे वनों और जल संसाधनों से समंजस्य के साथ, जैव विविधता आधारित कृषि-परिस्थितिकी मॉडल, जैव विविधता को बढ़ाएगा और जैविक पदार्थ को उसके प्राकृतिक चक्र में लौटाते हुए जलवायु संकट को बढ़ने से रोकेगा.

हम खेतिहरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करेंगे ताकि खेतिहर और किसान छोटी स्तर की खेती के साथ भी सम्मान सहित रह सके और उन्नति कर सके. खेतिहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने वाले अन्य लोगों के संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र (UN Declaration on Rights of the Peasants and Other People Working in Rural Areas- {UNDROP}) और खाद्य संप्रभुता के मौलिक अधिकार ; खाद्य संप्रभुता को हासिल करने के औज़ार हैं. आत्म निर्भरता और आत्म परिपूर्णता के सिद्धांतों पर आधारित स्वतंत्र और समृद्ध समाजवादी शक्ति के निर्माण में लगे लोगों और डी.पी.आर.कोरिया के कृषि कार्यकर्ताओं की कोशिशों के प्रति हम समर्थन और एकजुटता जाहिर करते हैं. डी.पी.आर.कोरिया, वेनेजुएला, क्यूबा में भोजन के अधिकार को चुनौती देते हुए लगाई गयी पाबंदियों के प्रति हम गंभीर चिंता प्रकट करते हैं. इन देशों का आत्म निर्भर मॉडल दुनिया भर में खाद्य संप्रभुता हासिल करने वाली समाजवादी अर्थव्यवस्था निर्माण करने के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है. 

खाद्य संप्रभुता और कृषकों के अधिकारों की पूर्ण प्राप्ति के लिए हम मांग करते हैं कि :

  1. हमें ज्ञात हुआ है कि नेपाल में राष्ट्रीय किसान आयोग सरकार और किसानों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. राष्ट्रीय किसान आयोग खेतिहरों, किसानों और कृषि मजदूरों के अधिकारों के संरक्षण और खाद्य संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए कार्य कर रहा है. हम दुनिया भर में तमाम सरकारों से आग्रह करते हैं कि वे ऐसे शक्तिशाली और संवैधानिक कार्यकारी आयोगों का गठन करें.
  2. सभी प्राकृतिक और उत्पादक संसाधनों पर बटाईदारों, खेतिहरों और खाद्य उत्पादकों का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए सभी देशों में वैज्ञानिक भूमि सुधार समेत वास्तविक कृषि सुधार किए जाने चाहिए. इसका आशय यह है कि जमीन पर पूरा अधिकार को अपने इलाके पर देशज लोगों के वैधानिक अधिकारों के रूप में मान्यता देना, मछली उत्पादक क्षेत्रों और परिस्थितिकीय तंत्र पर मछुवारा समुदायों की पहुँच और नियंत्रण को सुनिश्चित करना.
  3. छोटे और सीमांत किसानों को भूमि पर अधिकार दिलवाने के कानून बनाए और लागू किए जाएँ. भूमि को उत्पादक संसाधन की मान्यता दी जाये और जमीन जोतने का अधिकार उन किसानों को दिया जाना चाहिए जो हकीकत में खेती करें. अनुपस्थित भूमिधरी को हतोत्साहित किया जाना चाहिए.
  4. कृषि उत्पादन, प्रसंस्करण और वितरण में सहकारी और सामूहिक मॉडल को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए
  5. ताकि सारी कृषि भूमि को जोता जा सके, जिससे खाद्य उत्पादन व उत्पादकता बढ़े और किसानों की आजीविका में सुधार हो सके. ऐसे मॉडल को प्रोत्साहित करने के लिए नीतिगत माहौल और आवश्यक समर्थन की जरूरत पड़ेगी. 
  6. प्रकृति के साथ हमारे जुड़ाव, हमारे भोजन, हमारी संस्कृति, अच्छी सेहत और कृषि को हमारे जीवन के तरीके के रूप में स्थापित करने के लिए स्थानीय स्तर पर उत्पादित जैविक भोज्य पदार्थों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. रसायनिक खाद और कीटनाशकों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए.
  7. महिलाओं के लिए न्याय और समानता हासिल हो, इसके लिए सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाओं का रूपान्तरण करना होगा,जिसके लिए जमीन पर समान अधिकार, ऋण, शिक्षा, सामाजिक लाभ और शक्ति में हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी होगी. 
  8. बाजार और उत्पादन पर बहुराष्ट्रीय निगमों और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रभुत्व को रोका जाना चाहिए.
  9. व्यक्तिगत किसानों को कृषि आगत पर सब्सिडी और फसल और पालतू पशुओं के बीमा की गारंटी की जानी चाहिए. किसान कल्याण और राहत के लिए कोष स्थापित किया जाये, जिसमें से खाद्य उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख में शामिल सभी लोगों-मछुवारों, देशलोग, भूमिहीन मजदूर, पशुचारक और वन आश्रित समुदायों को मुआवजा हासिल करने का अधिकार हो.
  10. छोटे किसानों और मछुवारों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाये. कृषि के लिए बजट आवंटन बढ़ाया जाये. राज्य, किसानों के उत्पाद वाजिब धाम पर खरीदने की गारंटी करे.
  11. कृषि मजदूरों के लिए अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन के संधि पत्र को लागू किया जाये, उन्हें मजदूरों के तौर पर मान्यता दी जाये और उनके लिए राष्ट्रीय श्रम कानून बनाए जाएँ. महिला और पुरुषों को समान काम के लिए समान मजदूरी मिले, बाल मजदूरी प्रतिबंधित हो.
  12. कृषि-परिस्थितिकी और कृषि-वानिकी को कृषि विकास नीति में एकीकृत किया जाये. किसानों के उत्पादों की आपदाओं, जंगली जानवरों, अंतर्राष्ट्रीय बाजार और डम्पिंग आदि खतरों से रक्षा की जाये.
  13. विश्व व्यापार संगठन को कृषि से बाहर रखा जाना चाहिए. किसानों की विदेशी और बाहरी बाज़ारों से आर्थिक तौर पर रक्षा की जानी चाहिए.
  14. किसानों के योगदान पर आधारित पेंशन लागू की जानी चाहिए.
  15. खेतिहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने वाले अन्य लोगों के संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र को आधार बनाते हुए हर देश किसान अधिकार संबंधी कानून बनाए और लागू करे.
  16. मछुवारों और किसान आंदोलनों समेत किसानों पर अपराधियों के हमलों पर रोक लगाई जाये. दक्षिण एशिया में मछुवारों पर ज़्यादती बंद की जाये.
  17. अलग-अलग देशों में भिन्न-भिन्न प्रावधान हैं. अच्छे दस्तूर और सफल उदाहरण हैं. यह महत्वपूर्ण है कि हम एक दूसरे से सीखें और नीतिगत सुधारों के लिए ऐसे मॉडल संस्तुत करें. नेपाल ने पहले ही खाद्य संप्रभुता को मौलिक अधिकार के रूप में संविधान में शामिल कर लिया है. वहाँ जन पक्षधर सरकार ने खाद्य संप्रभुता को साकार करने के लिए नीतियाँ बनाने हेतु त्वरित कदम उठाए हैं. इसलिए हमारे पास अच्छा अवसर है कि हम नेपाल से सीखें और अपने-अपने देशों में खाद्य संप्रभुता के संघर्ष को मजबूत करें. हम अपनी सरकारों का आह्वान करते हैं कि वे छोटी जोतधारकों के अधिकारों को सुरक्षित करने के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मानदंडो का पालन करें. हम यह भरोसा दिलाते हैं कि राज्य की ऐसी पहलकदमियों का हम पूर्ण मनोयोग से समर्थन करेंगे.

किसान एकता जिंदाबाद! वैश्विक एकजुटता जिंदाबाद!

 

"खाद्य संप्रभुता और किसान अधिकार"

पर नेपाल में अंतर्राष्ट्रीय किसान सम्मलेन

पुरुषोत्तम शर्मा

नेपाल के राष्ट्रीय किसान आयोग द्वारा 10, 11 मार्च को "खाद्य संप्रभुता और किसान अधिकार" विषय पर काठमांडू में दो दिन के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया. सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि नेपाल के प्रधानमंत्री कामरेड केपी ओली थे. सत्र की अध्यक्षता राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष कामरेड चित्र बहादुर ने की. नेपाल, भारत, पाकिस्तान, बंग्लादेश, श्रीलंका, उत्तर कोरिया, फिलीपींस, मलेशिया, इंडोनेशिया के किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भाग लिया. भारत से अखिल भारतीय किसान महासभा की ओर से राष्ट्रीय सचिव कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा, अखिल भारतीय किसान सभा की ओर से महासाचिव कामरेड हन्नान मौलाह और खाद्य संप्रभुता नेटवर्क दक्षिण एशिया की उज्जयिनी हलीम ने सम्मेलन में भागीदारी की.

काठमांडू सम्मेलन के पहले सत्र में किसान आयोग की प्रस्तुति में नेपाल की कृषि और उस पर निर्भर दो तिहाई आबादी के खाद्य सुरक्षा व आजीविका के सवालों को पेश किया गया. प्रधान मंत्री कामरेड केपी ओली ने कहा कि नेपाल ने खाद्य संप्रभुता और खाद्य सुरक्षा की संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा दे दिया है. उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में हमें बड़े कदम उठाने होंगे. नेपाल को दो बातें चल रही हैं एक भूमि के निजी स्वामित्व का ख़ात्मा चाहते हैं. दूसरे किसानों की कोआपरेटिव के जरिये खेती को विकसित करना चाहते हैं. विपक्षी कांग्रेस के पूर्व मंत्री मिनेन्द्र रिजा के भाषणों से लगा कि नेपाल में सहकारिता के आधार पर खेती के लिए आम सहमति बन सकती है. नेपाल में खेती किसानी और उस पर निर्भर बड़ी आबादी की आजीविका पर गंभीर बहसें चल रही हैं. इस लिए आज यहां की सरकार के साथ ही विपक्ष व आम जनता में भी इस सवाल पर जद्दोजहद जारी है. दूसरे सत्र में भी इंडोनेशिया, फिलीपींस, मलेशिया और श्रीलंका के प्रतिनिधियों ने अपने देशों की कृषि अर्थव्यवस्था और किसानों के हालत पर अपने तथ्य, विश्लेषण और सरकारों की भूमिका पर अपनी प्रस्तुति दी. प्रस्तुतियों के बाद सवाल जवाबों का कार्यक्रम चलता था. सम्मेलन में दिखा कि देश दुनिया के भूगोल में कोई कहीं भी हो, पर जिनकी बड़ी आबादी कृषि व उसके सहायक रोजगार पर निर्भर है, हम सब की समस्या एक सी है.

एक सत्र में नेपाल सरकार के कृषि मंत्रालय की ओर से खाद्य संप्रभुता व खाद्य सुरक्षा पर तैयार की जा रही प्लानिंग पर एक प्रस्तुति थी. नेपाल को 10 साल में पूर्ण रूप से जैविक उत्पादन का देश बनाने का लक्ष्य भी है. खेती नेपाल की बड़ी आबादी के रोजगार का आधार बने, उसे लेकर ज्यादा उत्पादन, व्यावसायिक खेती की तरफ बढ़ने की योजनाएं थी.

बाद में प्रश्न काल में मैंने खेती की जमीन और अपने बीजों को बचाने का संकल्प प्रस्तुति में न होने की बात उठाई. जिसे बचाए बिना खाद्य संप्रभुता की रक्षा नहीं की जा सकती. खाद्य सुरक्षा के लिए पीडीएस सिस्टम को "हर जरूरतमंद को जरूरत के अनुसार" और किसानों को संरक्षण देने के लिए लाभकारी मूल्य पर उनकी सभी फसलों की खरीद की गारंटी को भी नितियों में शामिल करने का सुझाव दिया.

उसके बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश की ओर से प्रजेंटेशन था. पाकिस्तान में 65 प्रतिशत जमीन अभी भी बड़े जमीन्दारों के पास है. 1957, 1972 और 1979 में तीन बार वहां भूमि सुधार के कानून बने. पर वहां की शरीयत अदालत ने बाद में इन भूमि सुधार कानूनों को इस्लाम के खिलाफ घोषित कर दिया. पाकिस्तान और बंग्लादेश दोनों देशों में मछुवारों के सवाल भी समान रूप से मौजूद हैं. उत्तर कोरिया से खेत मजदूर यूनियन के उपाध्यक्ष किल संग बोंग ने अपने देश के संकट को गिनाया. उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया की जनता अपने देश के जन्म से ही अमरीकी साम्राज्यवाद के प्रतिबंधों और षड्यंत्रों को झेल रहे हैं. न हमें बाहर से कुछ लाने दिया जाता है और न ही कुछ बेचने दिया जाता है. हमारी जनता काफी कठिनता के साथ साम्राज्यवाद से लड़ते हुए  अपने सीमित संशाधनों के न्यायपूर्ण बटवारे के साथ आगे बढ़ रही है.  बातचीत में जानकारी मिली कि उत्तर कोरिया में खेती की जमीन का निजी स्वामित्व नहीं है. गांव-गांव में कृषि मजदूरों की सहकारी समितियां बनाई गई हैं. जमीन उन्हें सौंपी गई है. सरकार ने हर सहकारी समिति को एक इंजीनियर और एक कृषि वैज्ञानिक दिया है. समितियां आधुनिक और वैज्ञानिक खेती करती हैं. अपना उत्पादित माल सरकार को बेचती हैं और उससे हुई आय का आपस में न्यायपूर्ण बटवारा करती हैं.

12 मार्च काठमांडू में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में आए विदेशी मेहमानों को काठमांडू के नजदीक के पर्यटन स्थलों धूलिखेल और बुद्ध के स्वयंभू मंदिर को दिखाया गया. वैसे तो हिमालय काठमांडू से ही दिखता है, पर धूलीखेल से हिमालय की बड़ी रेंज दिखती है. हां राजधानी के पास बांज के घने जंगल देखकर जरूर सुकून मिला. नेपाल की राजधानी काठमांडू पहाड़ों और जंगल के बीच एक सुंदर नगर है. यह 50 लाख की आबादी वाला नगर तीन जिलों काठमांडू, ललितपुर और भक्तपुर की सीमा को अपने अंदर समेटा है. यहां एक ऊंची पहाड़ी पर बुद्ध का स्वयंभू मंदिर है, जिसकी परिक्रमा करते घटी में बसा पूरा काठमांडू दिख जाता है.