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केंद्र व राज्य सरकारों के इच्छाशक्ति के अभाव में अटका रहा कदवन डैम
September 12, 2019 • Purushottam Sharma

केंद्र व राज्य सरकारों के इच्छाशक्ति के अभाव में अटका रहा कदवन डैम
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सोन नहरों को जिदा रखने के लिए तीन दशक पूर्व जिस कदवन जलाशय योजना, (अब इंद्रपुरी जलाशय योजना) का शिलान्यास किया गया, उसका क्या हुआ। उसपर नेताओं को हिसाब देना ही होगा। क्योंकि यह परियोजना पेट भर अनाज व बच्चों के भविष्य से जुड़ी है। नेताओं को यह बताना पड़ेगा कि इंद्रपुरी बराज पर जल भंडारण क्षमता सिमटने व वाणसागर तथा रिहंद के पानी के भरोसे लाखों किसानों की खेती के लिए स्थाई हल अब तक क्यों नहीं निकाला गया,उल्टे नहरों के पानी को थर्मल पावर स्टेशन को दिया जा रहा है इससे अच्छा तो डैम का निर्माण कर उससे भी बिजली उत्पादन किया जा सकता था

अखिल भारतीय किसान महासभा सोन अंचल के नेताओं की टीम जो महासचिव राजाराम सिंह के नेतृत्व में कदवन दौरे पर गई थी उन्होंने ढेर सारी बिंदुओं पर अध्ययन किया, स्थानीय लोगों से बात की, जलमग्न क्षेत्र,विस्थापन, पर्यावरण संरक्षण सहित अनेक विषयों पर गहरा मंथन किया और पाया कि डैम का निर्माण होने से वन्य जीव, पर्यावरण पर कोई नुकसान नहीं होगा बल्कि शाहाबाद और मगध क्षेत्र खुशहाल हो जाएगा

इंद्रपुरी बराज पर जल प्रवाह कम होने से गाद की मात्रा बढ़ती जा रही है जिससे जल भंडारण की क्षमता कम हो गई है. जिसकी वजह से पूर्वी एवं पश्चिमी सोन नहर सिंचाई प्रणाली के वितरणियों के अंतिम छोर पर हजारों गांवों के खेतों को सिंचाई का पानी नहीं मिल पा रहा है. जानकार बताते हैं कि इन्द्रपुरी बैराज के ऊपरी जल ग्रहण क्षेत्र में जल की कमी होने की वजह से सोन नदी के प्राकृतिक सरंचनाओं पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है तथा इसके जल प्रवाह में भारी कमी हो रही है.

इन्द्रपुरी बैराज के नीचे उत्तर पूर्व की ओर औरंगाबाद एवं अरवल जिला स्थित सोन नदी भू-भाग में काश के जंगल तथा घास उग गए हैं जिसकी वजह से नदी का विशाल भू-भाग तथा प्राकृतिक सरंचना रेगिस्तान में बदलती जा रही है. लोग सोन नदी को इन समस्याओं से बचाने के लिए भी कह रहे हैं. ज्ञात हो कि बिहार के रोहतास जिले में डिहरी ऑन-सोन के पास सोन नदी पर बना इन्द्रपुरी बैराज काफी लम्बा बैराज है. इसकी कुल लंबाई 1407 मीटर है.

इस बैराज के दोनों तरफ नहरे निकली गई है जिससे अभी पूरे क्षेत्र की सिंचाई नहीं हो पा रही है. सोन नदी प्रोजेक्ट का काम आजादी के पूर्व 1874 में एक प्रसिद्ध अंग्रेज इंजीनियर ने शुरू किया था. तब यह योजना किसानों के हितों को देखते हुए बनाई गई थी. लेकिन आजादी के बाद इस परियोजना को राजनीतिक चश्में से देखा जाने लगा, जिसकी वजह से सोन नहर सिंचाई परियोजना में बराबर बदलाव आता रहा. किसानों की हितों की अनदेखी कर सिर्फ राजनीतिक हित साधने का मुद्दा इन्द्रपुरी बैराज बन गया है. 

आज जब उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारें सोन नदी जल बंटवारे के समझौते के अनुरूप बिहार को पानी नहीं दे पा रही हैं, तब भी कोई राजनीतिक सुगबुगाहट नहीं है. यहां तक की बिहार से बंटकर अलग हुआ झारखंड भी बिहार के हितों की अनदेखी कर रहा है. नहरों में उचित मात्रा में पानी का नहीं आना बिहार सरकार के राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और संबंधित विभागों के पदाधिकरियों की उदासीनता का परिणाम है. पता नहीं किसानों के हित के लिए बिहार सरकार कब जागेगी.