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मोदी राज में 4 लाख करोड़ का कोयला घोटाला
September 10, 2019 • Purushottam Sharma

मोदी राज में 4 लाख करोड़ का कोयला घोटाला:

बिना नीलामी 358 कोयला खदानों को 50 साल का एक्सटेंशन

बात किसी से छुपी नहीं है कि केंद्र में बीजेपी की सरकार के गठन के पीछे 1 करोड़ 76 लाख रुपये वाले कथित कोयला घोटाले का बहुत बड़ा हाथ था। हालांकि कोर्ट भी इसके घोटाला होने की बात को अब खारिज कर चुका है। सच्चाई अब सामने आ रही है। यह पूरा मामला एक साजिश के तहत खड़ा किया गया था। क्योंकि यह आंकड़ा तत्कालीन सीएजी विनोद राय द्वारा सामने लाया गया था और फिर बीजेपी के सत्ता में आने के बाद उन्हीं विनोद राय को बीसीसीआई में अहम पद देकर उपकृत कर दिया गया है। इस पूरी परिघटना के बाद अब कुछ कहने के लिए बचता नहीं है। लेकिन यहां मकसद विनोद राय के कैरियर पर बहस करना नहीं है।

इस पूरे प्रकरण के बाद जो बात सामने आयी थी और विपक्षी दलों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जिस नतीजे पर पहुंचे थे वह यह था कि कोयले के आवंटन की प्रक्रिया अब सिर्फ और सिर्फ नीलामी के जरिये पूरी की जाएगी। उसके अलावा किसी दूसरे रास्ते को नहीं अपनाया जा सकता है क्योंकि वह भ्रष्टाचार को पनपने का मौका मुहैया कराता है।

लेकिन विडंबना देखिये जो पार्टी सबसे ज्यादा इसकी वकालत कर रही थी और स्वर्गीय अरुण जेटली जिसके सबसे बड़े प्रवक्ता बने थे। और उन्होंने इस पर कई ब्लाग भी लिखे। अब उसी पार्टी के सत्ता में आने के बाद बताया जा रहा है कि नीलामी में जाए बगैर 358 कोयला खदानों को 50 साल के लिए एक्स्टेंशन दे दिया गया है। और कई खदानें अभी पाइप लाइन में हैं।

एक आंकड़े के मुताबिक इससे सरकार को तकरीबन चार लाख करोड़ रुपये के नुकसान की आशंका है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले पर सरकार को नोटिस जारी किया है। गौरतलब है कि यूपीए के समय भी कोर्ट का यही स्टैंड था कि नीलामी के बगैर कोयले का आवंटन नहीं होना चाहिए।  

दरअसल यह काम रेट्रोस्पेक्टिव तरीके से पुराने कानून में बदलाव के जरिये किया गया है। जिसके तहत The Mines & Minerals Regulation Development Act 2015 में संशोधन से पहले की जितनी लीज हैं उन सबको 50 साल का एक्सटेंशन दे दिया गया है। इस तरह से 358 कोयला खदानों को एक्स्टेंश दे दिया गया है और बाकी 288 अभी पाइपलाइन में हैं।

दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पांच महीने पहले नोटिस दिया था लेकिन सरकार ने अभी तक उसका जवाब नहीं दिया। अगस्त के प्रथम सप्ताह में फिर से सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को 3 हफ्ते का समय दिया, वह भी समाप्त हो गया। और सरकार की ओर से अभी तक जवाब नहीं गया है।

सरकार को जरूर देश को यह बताना चाहिए कि आखिर वो कौन-कौन से उद्योगपति हैं जिनको सरकार ने उपकृत किया है। जिन 35 विधेयकों को संसद से पारित कराने का तमगा अपने सीने पर सरकार बांध रही है उन्हीं में यह बिल भी शामिल था। जिसे सरकार ने आनन-फानन में पास करवा दिया। जब यह बिल पारित हो रहा था तब विपक्षी दलों के नेताओं गुलाम नबी आजाद और मणि शंकर अय्यर ने उसका विरोध भी किया था। और कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा का कहना है कि उन लोगों ने उसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की मांग की थी। लेकिन सरकार ने उनकी एक नहीं सुनी। खेड़ा की मानें तो सरकार के कुछ मंत्रियों ने भी इसका विरोध किया था।

इसका सबसे ज्यादा नुकसान राज्यों को उठाना पड़ा है। क्योंकि उनका राजस्व ऑक्शन के रूट से ही आता है। ओडिशा से लेकर झारखंड, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि तमाम राज्य इसमें शामिल हैं। पूरा देश जानता है कि राज्यों की आर्थिक स्थिति क्या है। लिहाजा सरकार ने इस फैसले के जरिये न केवल संघीय ढांचे की व्यवस्था का उल्लंघन किया है बल्कि राजस्व के तौर पर सूबों का बड़ा नुकसान भी किया है। सत्ता में आने के बाद सरकार ने उस फेडरल स्ट्रक्चर के साथ कितना मजाक किया। यह उसका नायाब उदाहरण है।

दरअसल इसके जरिये केंद्र चाहता है कि राज्यों की सरकारें उसके रहमोकरम पर रहें। लेकिन उसे इस बात को समझना चाहिए कि राज्यों के कमजोर होने से उसका पूरा असर सीधे जनता पर पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने उसी समय कहा था कि प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन के लिए नीलामी सर्वोच्च प्राथमिकता का रास्ता होना चाहिए जब तक कि उससे बेहतर कोई विकल्प न तलाश लिया जाए।

अब अगर उससे बेहतर कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं था तो सरकार को जरूर इस देश को बताना चाहिए कि उसने ऐसा क्यों किया। और न केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन किया बल्कि जनता का बड़ा नुकसान भी हुआ।

बताया जा रहा है कि इससे तकरीबन 4 लाख करोड़ के राजस्व की हानि मिनिमम हुई है। कांग्रेस ने इस पूरे मामले की जांच की मांग की है। उसने कहा है कि इस बात का पता लगाया जाना चाहिए कि यह सब कुछ किसको लाभ पहुंचाने के लिए किया गया। और बदले में इसका क्या लाभ हासिल किया गया और वह किसको-किसको हुआ है।

खुद उस बिल में कहा गया है कि सभी खदानों की लीज जो 2015 के माइनिंग एक्ट के पहले आवंटित की गयी थीं उन्हें 50 साल के लिए एक्स्टेंशन दिया जाता है। और वह 31 मार्च 2020 होगा।

    जनचौक से साभार