ALL लेख आंदोलन रिपोर्ट विज्ञप्ति कविता/गीत संपादकीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन
अन्नदाता किसान को कोरोना काल में संरक्षण की जरूरत
April 19, 2020 • Delhi • लेख

अन्नदाता किसान को कोरोना काल में संरक्षण की जरूरत

वीएम सिंह

कोरोना महामारी के कारण पूरे देश में लोक डाउन है। हर व्यक्ति भविष्य को लेकर डरा हुआ है। पर एक बात से पूरा देश निश्चिन्त है कि हमारे पास खाने के लिए भरपूर खुराक है। अनाज के पुराने पर्याप्त भण्डारण के कारण आज देश को खुराक मिल रही है। दो महीने पहले ओलावृष्टि से फसलों का नुकसान हुआ और अब समय गेंहू, सरसों आदि काटकर भण्डारण भरने का है। अगर किसान भी कोरोना के कारण घर बैठ जाएगा और अपनी फसल नहीं काटेगा या नई फसल नहीं लगाएगा तो अगले साल देशवासियों को अन्न खाना मुश्किल हो जाएगा। हमको यह देखना है कि एक तरफ आगे देश का भण्डारण भरा रहे इसलिए रबी की फसलों की कटाई भी हो, दूसरी तरफ किसान महामारी से भी बचे रहें। इसलिए कुछ खास बातों पर नज़र डालें कि क्या कोरोना से बचने के लिए सरकार ने किसान को कुछ सुविधाएं दी हैं? कुछ ऐसा किया है जिससे किसान की मदद हो या हर साल की तरह इन हालातों में भी किसान अपने आर्थिक रूप से कमजोर कंधों पर देश को खिलाने की ज़िम्मेदारी ले सके।

विडम्बना देखिए एक तरफ जो देशवासी घरों में बैठें हैं उनके पास मास्क एवं सैनिटाइजर हैं और जो महामारी से लड़ते हुए फसल काट रहे हैं उनके पास अपने बच्चों के लिए कुछ नहीं है। जबकि गेंहू की हाथ से कटाई से लेकर थ्रेशर में गहाई करने तक घट्टे के कारण दमे की बीमारी फैलती है। थ्रेशर में पुली डालने वाला व्यक्ति 10 मिनट भी गमछा लगाए बिना खड़ा नहीं रह सकता। क्योंकि कोरोना भी सांस ओर दमे को पकड़ता है, इसलिए इस समस्या से निजात पाने के लिए मैने मुख्यमंत्रीयों को चिट्ठी में कहा कि भले छोटे किसान पशुओं के लिए भूसे के लालच में हाथ से गेंहू कटाई करते हैं पर वहीं हाथ से काटने के साथ साथ गहाई करते वक्त एवं भूसा इकठ्ठा करते वक्त सांस की बीमारी होने का खतरा रहता है। कोरोना के प्रकोप में ये बड़ा संकट प्रकट हो सकता है इसलिए सीएम से गुजारिश की कि छोटे मझौले किसानों को भी कम्बाइन हार्वेस्टर से फसल कटवाने के लिए प्रोत्साहन राशि देने की कृपा करें।

हमने कुछ अन्य सुझाव भी दिए जो निम्नलिखित हैं - 

(i) अगर किसान कम्बाइन हार्वेस्टर से फसल कटाएगा तो ही उसे 100 रुपये क्विन्टल की प्रोत्साहन राशि मिलेगी।

(ii)भूसे के लालच में न पड़े इसलिए अगले एक साल के लिए दूध पर 5 रुपये प्रति लीटर अतिरिक्त मूल्य दिया जाय ताकि किसान चारे की व्यवस्था कर पाए। क्योंकि दूध से ही ग्रामीणों की जीविका चलती है। आज जब लोकडाउन में हलवाई, चाय वाले, ढाबे एवं होटल आदि बन्द होने के कारण दूध के भाव गिर गए हैं वहीं पशुओं के चारे का दाम महंगा हो गया है। इस स्थिति में किसान को प्रोत्साहन देना ओर भी जरूरी है। ये सही है कि छोटा मजदूर कटाई की तरफ देखता है परन्तु हमें इस समय लोगों को सांस की बीमारी या कोरोना के संक्रमण से भी बचाना है।

(iii) कम्बाइन हार्वेस्टर में ब्रेकडाउन होता रहता है इसलिए हर ब्लॉक में मिस्त्री, स्पेयर पार्ट, वेल्डिंग एवं पंचर की एक या दो दुकानें खुली रहना जरूरी है ।

(iv) सरकारी गेंहू खरीद के लिए खरीद केंद्रों को खेत या गांव से खरीदने का निर्देश दे। पूर्व में भी सेंटर इंचार्ज खेतों से 100-200 रुपये प्रति क्विन्टल नाजायज़ रुप से लेकर खरीदते थे। 

(v)सब्जियां व फल गांव से सब्जी मंडी तक नहीं पहुंच पा रही है।जबकि शहरों में सब्जियों के दाम 4 गुना तक बढ़ गए हैं। इसलिए सब्जी मंडी भी खोली जाए और किसान को अपनी सब्जी मंडी तक लेकर जाने की अनुमति दी जाए। जिससे किसान को फसल का दाम भी मिलेगा और शहर वालोों को सब्जी सस्ते दाम पर भी उपलब्ध हो पाएगी।

(vi) जहां गन्ने के भुगतान के लिए किसान मारा मारा फिर रहा है, वहीं कुछ जगहों पर सट्टे वाले गन्ने की पैरोई किए बिना मिलें बन्द हो गईं हैं। मैंने उन्हें बताया कि पिछले 25 वर्षों में जब भी मिलें निर्धारित सट्टे की पैरोई के बिना बन्द हुईं तो हाई कोर्ट ने आदेश दिए कि गन्ने के निर्धारित सट्टे की पैरोई के बिना मिल बन्द नहीं हो सकती वरना खड़े गन्ने का भुगतान मिलों को करना होगा। 1996 में तो कोर्ट के आदेश के तहत बन्द मिलों ने भी अगस्त तक गन्ने की पैरोई की।

मैंने मुख्यमंत्री से गुजारिश की कि गन्ने की बुआई का समय निकल रहा है और निर्धारित सट्टे से अलग भी गन्ना खड़ा है। इसलिए अतिरिक्त सट्टे बनवाने का निर्देश दें जिससे किसान का खेत खाली हो पाए और वो आगे बुआई कर पाए। मिलें तो चालू हुईं, पर अभी तक अतिरिक्त सट्टे का आदेश नहीं आया।

जहां कोरोना के मामले दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं वहीं किसानों की सुरक्षा के लिए न तो कोई इंतेजाम किये गए और न ही कम्बाइन से कटवाने वाले को प्रोत्साहन दिया गया। कम से कम गहाई करने वाले मजदूरों और किसानों को एवं खरीद केंद्र के मजदूरों को डॉक्टर वाले N95 मास्क दें ताकि कोरोना और दमे का प्रकोप कम हो।

मैंने अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक के नाते प्रधानमंत्री को 9 अप्रैल 2020 को चिट्ठी लिखी जिसमें कहा है कि जहां उनकी सरकार ने लॉकडाउन से किसानों के लिए सहूलियतें प्रदान की हैं वहीं कुछ अधिकारी आज भी किसानों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। जो मजदूर सैंकड़ों मील चलकर अपने गांव कटाई करने पहुंचे उन्हें रोका जा रहा है। कम्बाइन, ट्रैक्टर ट्राली एवं लेबर को रोका जा रहा है। पैसा देने पर सब सही है वरना लोकडाउन का वास्ता देते हुए चालान काट देते हैं।

मैंने प्रधानमंत्री से ये भी कहा कि इन कोरोना की परिस्थितियों में किसान अपनी जान की परवाह न करते हुए देश के लिए फसल की कटाई करने बाहर निकल रहा है उसे प्रोत्साहन राशि मिलनी चाहिए। पर उसे अपनी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी नहीं मिल रहा। देश की सेवा करने का ये सिला मिल रहा है कि जहां गेंहू कट गया है वहां 1925 रुपये प्रति क्विन्टल की बजाय किसानों को 1400 से 1700 रुपये प्रति क्विन्टल मिल रहा है।

उनसे कहा कि किसानों की फ़सलों का पहले ही ओलावृष्टि से काफ़ी नुकसान हो चुका है इसलिए जरूरी है कि आदेश दिए जाएं किसान की पूरी फसल खेत से सरकारी भाव (एमएसपी) पर खरीदी जाएगी। उनसे यह भी कहा कि अगर सरकार आर्थिक स्तिथि कमजोर होने के कारण सारी फसल नहीं खरीद सकती तो उसे आदेश करने चाहिए कि बाजार में कोई भी एमएसपी से कम मूल्य पर नहीं खरीदेगा वरना उसके खिलाफ फौजदारी का मुकदमा चलेगा। आखिर पेट्रोल, डीजल, खाद, बिजली आदि सरकारी रेट से कम खरीदना जुर्म है न।

मैंने उन्हें बताया कि सब्जियां खराब हो रही हैं, फल का भी बुरा हाल है। केला 2 से 4 रुपये किलो बिक रहा है। जहां किसान का नुकसान हो रहा है वहीं उपभोक्ता को 4-5 गुणा महंगा मिल रहा है। क्योंकि कोरोना वायरस से मुकाबला करने के लिए इम्युनिटी बढ़ानी चाहिए जो सब्जी ओर फल में होती है। इसलिए इस आपातकालीन स्तिथि में सब्जी और फलों का एमएसपी निर्धारित किया जाए जिससे एक हाथ में किसान लूटने से बचेगा वहीं उपभोक्ता को सस्ता मिलेगा।

इसके साथ साथ दूध का रेट हलवाई, रेस्तरां, ढाबा एवं चाय की दुकानें बन्द होने से एकदम गिर गए हैं। इसलिए कुछ समय के लिए दूध का एमएसपी भी घोषित किया जाए। इस प्रयास से किसान और उपभोक्ता उजड़ती हुई अर्थव्यवस्था में कहीं न कहीं खड़ा रह पायेगा।

किसान हर बुरी घड़ी में देश के साथ खड़ा रहता है। वो अपने बुरे हाल या नुकसान की किसी से शिकायत नहीं करते, वे खुदगर्ज हैं अगर मांगता है तो केवल भगवान से। पिछले 20 सालों में 3.5 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं, पर देश का दिल उनके लिए नहीं पसीजा। इस आपदा के बाद तो देश को उसका सम्मान देना होगा, उसका हक देना होगा। मैं नहीं कह रहा उसके लिए अपनी बालकॉनी में खड़े होकर ताली या थाली बजाओ, पर उसको उसकी फसल का सही न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर उसका आभार प्रकट कर सकते हैं।

देश में लगभग 5 करोड़ किसान एवं मजदूर गन्ने की खेती पर निर्भर है। 2-2 साल अपनी फसल का पैसा नहीं मिलता है। ऐसा नहीं कि मिल घाटे में हैं, पर कहीं न कहीं उन्हें सरकार से शह मिलती है । पिछले 15 सालों में 1 मिल मालिक ने 2 से 16 मिलें बना ली, वहीं उसी दौरान उत्तर प्रदेश में 35 निजी मिलों से 95 निजी मिलें हो चुकी हैं। किसान को गन्ना लगाने के लिए बैंक या सोसाइटी से ऋण पर ब्याज देना पड़ता है, पर हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी किसानों को मिल मालिकों ने ब्याज नहीं दिया। ब्याज तो देना पड़ेगा। मिल मालिकों को 11-12% ब्याज दर पर बैंक लोन देते हैं और जब मिल को 15% ब्याज किसानों को देना पड़ेगा वो किसान को तत्काल पैसे देंगे। कोरोना की महामारी में अगर सरकार किसान को ब्याज दिलवा दे तो सोने पर सुहागा, नहीं तो किसानों को उनके 
अपने गन्ने का पैसा ही दिलवा दे तो इस महामारी में एक तरफ गन्ने की बुआई में और दूसरी तरफ उन्हें रहन-सहन में मदद होगी।

पिछले कुछ सालों में देहात के 90% नौजवान खेती से अलग हो गए हैं। उनको नौकरी नहीं मिल रही। जो नौकरी में थे उनकी नोटबन्दी के बाद छूट गई। मज़दूर रियल एस्टेट बाजार में गिरावट होने से गांव में वापसी चले गए। नौजवान मायूस है, शादी नहीं हो रही कुछ नशे में चले गए और कुछ क्राइम की ओर। 
हम सबको मिल कर खेती को जिंदा कर नौजवानों को जीविका देने का काम करना है।

पहले कोरोना महामारी को रोकने का काम करें। शहर में इतनी तेजी से कोरोना नहीं फैलेगा पर देहात में ये तेजी पकड़ सकता है। इसलिए हमें कोशिश करके एहतियात बरतना है। मुझे पूरा विश्वास है कि पहले हम कोरोना पर जीत हासिल करेंगे और उसके बाद हम लोग खेती को ज़िंदा करेंगे और नौजवानों को जीविका देंगे।