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अपनी राजनीतिक दावेदारी जताते आदिवासी
October 18, 2019 • Purushottam Sharma

अपनी राजनीतिक दावेदारी जताते आदिवासी

पुरुषोत्तम शर्मा

इस बार महाराष्ट्र के नंदूरबाड जिले में दूसरी बार जाने का मौका मिला। पहली बार 2017 में किसान मुक्ति यात्रा के साथ वहां गया था। इस बार लाल निशान लेनिनवादी के आमंत्रण पर सत्य शोधक कम्युनिस्ट पक्ष के उम्मीदवारों के लिए विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए गया। 

नंदूरबाड जिले की सांकरी और नवापूर विधानसभा क्षेत्र से सत्य शोधक कम्युनिस्ट पक्ष ने अपने दो उम्मीदवार इस विधानसभा चुनाव में उतारे हैं। इस बार के चुनाव में लाल निशान लेनिनवादी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले) ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। पर महाराष्ट्र में वाम और अम्बेडकरवादियों के एक साझे तीसरे मंच के निर्माण के लिए लाल निशान भी सक्रिय रही और अब उसके नेता उस मंच के उम्मीदवारों के लिए प्रचार में भी जुटे हैं।

इस तीसरे मंच में सबसे बड़ी ताकत प्रकाश अम्बेडकर की पार्टी वंचित बहुजन आघाड़ी है। इसके अलावा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), सत्य शोधक कम्युनिस्ट पक्ष, शेतकरी संगठना (र.पा.) इसमें मुख्य रूप से शामिल हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस मंच में शामिल नहीं हुई और उसने अलग से अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं। सत्य शोधक कम्युनिस्ट पक्ष का काम मुख्य रूप से धूलिया और उससे अलग हुए नंदूरबाड जिले में आदिवासियों के बीच है। जिन दोनों सीटों पर उनके उम्मीदवार खड़े हैं वो दोनों सीटें जन जातियों के लिए आरक्षित हैं।

सत्य शोधक कम्युनिस्ट पक्ष का गठन 1978 में कामरेड शरद पाटिल ने किया था। वे इस क्षेत्र में आदिवासियों के बीच कार्यरत मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे। पार्टी में वर्ग के साथ जाति के सवाल को भी जोड़ने के मुद्दे पर उनका पार्टी से गहरा मतभेद हो गया। अंततः पार्टी लाइन से बाहर जाने के कारण उन्हें 1978 में माकपा से निष्कासित किया गया। इसी वर्ष उन्होंने अलग से इस संगठन का गठन किया और आदिवासियों के बीच अपना काम जारी रखा। उन्होंने जाति और वर्ग के सवाल पर अपने दृष्टिकोण के कारण ही नए संगठन का नाम सत्य शोधक कम्युनिस्ट पक्ष रखा। सत्य शोधक नाम ज्योतिबा फुले से प्रेरित होकर रखा गया है।

यह क्षेत्र आदिवासी बहुल है। इसमें भील आदिवासियों की संख्या सबसे ज्यादा है। जो जनजातियों में सबसे कमजोर और पिछड़ी जाति मानी जाती है। इसके अलावा कोंकणी, कोंकण, माउची हैं। धनगढ़ जाति लम्बे समय से खुद को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग कर रही है पर उन्हें अभी वह दर्जा नहीं मिला है। हांलांकि बाकी जनजातियां धनगढ़ को जनजाति का दर्जा देने का विरोध करती हैं।

अब कामरेड शरद पाटिल नहीं हैं। लगभग चार साल पहले उनका निधन हो चुका है। अब पार्टी के अध्यक्ष कामरेड रामसिंग गावित और कॉम करणसिंग कोकणी सेक्रेटरी हैं। कॉम किशोर ढमाले संगठक पद पर 2001 से कमान संभाले हुए है। कामरेड किशोर धमाले की राजनीतिक शिक्षा दीक्षा कामरेड शरद पाटिल के संरक्षण में हुई है। वे आदिवासियों के बीच संगठन और आंदोलन निर्माण पर लगे हैं। बीच के वर्षों में उनके आंदोलन को भारी सरकारी दमन और हमलों का सामना भी करना पड़ा। उनके काम और आंदोलन के साथ महाराष्ट्र के वामपंथी, अम्बेडरवादी संगठनों का समर्थन और बुद्धिजीवियों की सहानुभूति भी जुड़ी होती है।

आदिवासियों को उनके वनाधिकार और भूमि पर अधिकार के लिए कामरेड शरद पाटिल ने लम्बी लड़ाई लड़ी। इसके लिए उन्होंने सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी। सत्य शोधक कम्युनिस्ट पक्ष की लड़ाई का ही नतीजा था कि 7 मार्च 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने इन आदिवासियों को जमीन पर मालिकाना और वनाधिकार देने का आदेश दिया। पर जो लोग सुप्रीम कोर्ट गए हमारी सरकारों ने उन्हें अब तक भी भूमि का मालिकाना नहीं दिया है।

सत्य शोधक कम्युनिस्ट पक्ष ने धूलिया और नंदूरबाड जिलों के सभी आदिवासियों के वनाधिकार के दावे पेश किए हैं। लम्बी लड़ाई के बाद लगभग 40 प्रतिशत आदिवासियों को उनकी भूमि पर मालिकाना दिलाने में उन्हें सफलता मिली है। बाकी 60 प्रतिशत खारिज दावों पर अपील के साथ ही लड़ाई जारी है। लगभग 85 आदिवासी ग्राम पंचायतों की ओर से जमीन पर अधिकार के लिए मुकदमे दर्ज किए गए हैं।

यहां के आदिवासियों में महान स्वतंत्रता सेनानी टंट्या भील बीरसा मुंडा जैसा स्थान बनाए हुए हैं। टंट्या भील ने इस क्षेत्र में अंग्रेजों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की थी। खंडवा क्षेत्र में 1942 में जन्मे टंट्या भील को अंग्रेजों ने 4 दिसंबर 1889 में फांसी की सजा दी थी। कुछ का कहना है कि उन्हें गोली मार कर जंगल में फेंक दिया गया था। निमाड़ अंचल की गीत-गाथाओं में आज भी टंटया मामा को याद किया जाता है।

पिछले चार दशक से एक आदिवासी क्षेत्र में अपने आंदोलन और संगठन को टिकाए रखने वाले सत्य शोधक कम्युनिस्ट पक्ष ने किसान, छात्र और महिला संगठन बनाए हैं। इनके सभी जन संगठनों की कुल सदस्यता लगभग 30 हजार है। उनके संगठन की 11 सदस्यों की नेतृत्वकारी कमेटी है। जिला व तहसील मुख्यालयों तक कार्यालयों का निर्माण कर वहीं से आंदोलनों और संगठन का संचालन होता है।

आदिवासियों के बीच से कार्यकर्ताओं की एक बड़ी टीम तैयार हुई है। इस चुनाव में उस टीम की भूमिका भी दिख रही है। लगभग 100 आदिवासी कार्यकर्ता जिनमें एक दर्जन महिला भी हैं, घर छोड़कर रात दिन चुनाव प्रचार में जुटे हैं। शहरों में आदिवासी महिला पुरुष कार्यकर्ताओं का चुनाव प्रचार चलाना और घर-घर पर्चे बांटना देखकर एक प्रेरक अनुभव प्राप्त हुआ। इस तरह से इन दोनों सीटों पर आदिवासी अपनी राजनीतिक दावेदारी जता रहे हैं।