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भारत में संसदीय लोकतंत्र के खात्मे और फासीवादी राज्य की जमीन तैयार
April 6, 2020 • Delhi • संपादकीय

भारत में संसदीय लोकतंत्र के खात्मे और फासीवादी राज्य की जमीन तैयार

पुरुषोत्तम शर्मा

भारत में संसदीय लोकतंत्र के खात्मे और फासीवादी राज्य की जमीन लगभग तैयार है। कोरोना संकट की आड़ में आरएसएस-भाजपा अपने फासीवादी कारपोरेट हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को आगे बढ़ाने में योजनाबद्ध तरीके से जुट गए हैं। संसद में दो तिहाई से ज्यादा बहुमत, कारपोरेट और साम्राज्यवादी ताकतों का साथ, चारण भाट की भूमिका में खड़ा राष्ट्रीय मीडिया और भारतीय समाज को प्रभावित करने की क्षमता वाला खाया अघाया आत्म केंद्रित विशाल मध्यवर्ग का अंधा समर्थन इस तैयार होती जमीन के मजबूत आधार हैं। पहले ही भारत की अर्थव्यवस्था गोते खाते 5 प्रतिशत से नीचे आ चुकी थी। अब कोरोना संकट के कारण हुए पूर्ण लॉक डाउन ने इस गिरती अर्थव्यवस्था को लंबे समय के लिए और भी रसातल में धकेल दिया है। कोरोना संकट से निकलने के बाद भी उद्योगों और कारोबारों में बंदी और भारी बेरोजगारी की संभावना ज्यादा ही मौजूद है। इस संकट से देश को बाहर निकालने का कोई और रास्ता मोदी सरकार के पास नहीं है।  

अमेरिका से दोस्ती बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने भारत के पुराने मित्र राष्ट्रों और अपने सभी पड़ोसियों से संबंध बिगाड़े हैं। अब वही अमेरिका कोरोना संकट के कारण अपनी तबाह होती अर्थव्यवस्था, और इस संकट से अपने नागरिकों की रक्षा करने में विफल साबित हो रहा है। इस संकट से पूर्व पूरी दुनियां एक बड़ी आर्थिक मंदी के दौर से गुजर ही रही थी। अमेरिका और चीन के बीच चले ट्रेड वार ने इसे बढ़ाने में और मदद की। अब कोरोना के कारण दुनियां के एक बड़े हिस्से में लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंस ने आर्थिक गतिविधियों को थाम सा दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार कोरोना संकट के बाद पूरी दुनियां की जीडीपी में डेढ़ से दो प्रतिशत की कमी आ सकती है।

कोरोना संकट ने वैश्विक स्तर पर मानवता पर आए इस संकट से निपटने में विश्व पूंजीवाद की सीमाओं और असफलताओं को खुल कर उजागर कर दिया है। यह साफ हो गया है कि चंद लोगों और चंद बहुराष्ट्रीय निगमों के अकूत मुनाफे के लिए निर्मित ये पूंजीवादी व्यवस्थाएं मानवता पर आए संकटों का मुकाबला करने में असफल हैं। असल में ये व्यवस्थाएं इसके लिए बनी भी नहीं हैं। अमेरिका और यूरोप जैसे अति विकसित राष्ट्र कोरोना के सामने असहाय हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंम्प कोरोना से कम से कम 2 लाख अमरीकियों के मरने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। जिस मैक्सिको की सीमा से लोगों के अमरीका प्रवेश को रोकने के लिए अमरीका दीवार बना रहा था, आज उसी सीमा से अमरीकी लोग अपनी जान बचाने के लिए अमेरिका छोड़ कर बाहर भाग रहे हैं।

वहीं कम्युनिस्ट शासित चीन जहां से यह वायरस शुरू हुआ, अपनी मजबूत और सुसज्जित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, लॉक डाउन में फंसे अपने लोगों तक राशन और जरूरी रोजमर्रा की वस्तुएं पहुंचाने वाली विस्तृत व मजबूत विपणन प्रणाली के बल पर कोरोना को लगभग काबू कर चुका है। आज चीन दुनिया के तमाम देशों को कोरोना से लड़ने के लिए स्वास्थ्य उपकरण और दवाईयों के जरिये बड़े पैमाने पर मदद कर रहा है। क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार अपने यहां कोरोना के प्रवेश को अब तक रोक सकने में कामयाब है। क्यूबा दुनियां के कई देशों को कोरोना से लड़ने के लिए अपने डॉक्टर्स की सेवाएं दे रहा है। कोरोना से पीड़ित अपने नागरिकों से भरे शिप को जब इंग्लैंड ने अपनी जमीन पर रुकने से भी मना कर दिया था, तब क्यूबा ही था जिसने उस शिप को अपनी जमीन पर जगह दी बल्कि उन ब्रिटिश नागरिकों का इलाज भी कर रहे हैं। 

उत्तर कोरिया का वैसे भी बाहरी दुनिया से संपर्क बहुत कम है। फिर भी उसने भी अपनी मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और जनता की सुरक्षा के लिए समय पूर्व देश की सीमाओं को पूरी तरह लॉक कर अपने देश में कोरोना के प्रवेश को रोक रखा है। भारत में भी संघीय ढांचे में राज्यों को मिले अधिकार का इस्तेमाल कर केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने अपने बेहतर स्वास्थ्य प्रबंधन और पंचायत लेवल तक गरीबों के बीच भोजन, राशन, पानी व साबुन आदि की व्यवस्था कर कोरोना के पैर बांधने में कामयाबी पाई है। क्यूबा तो अमेरिका के उन मित्र राष्ट्रों की भी इस संकट में मदद कर रहा है जो अमरीका के दबाव में उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए हैं। पर दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र संघ, अमरीका और उसके सहयोगी राष्ट्र इस विश्वव्यापी संकट की घड़ी में भी क्यूबा, बेनेजुएला, ईरान, उत्तर कोरिया जैसे देशों पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंध नहीं हटा कर अपने अमानवीय शोषणकारी रवैये पर अड़े हैं।

वैश्विक स्तर पर कोरोना वायरस से उपजे इस संकट के बीच हंगरी की संसद ने अपने प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन को अनिश्चित काल के लिए सत्ता में बने रहने का अधिकार दे दिया है। हंगरी की संसद में कोविड-19 को लेकर एक बिल पारित किया गया है। जिसके तहत प्रधानमंत्री विक्टर को अनिश्चित काल के लिए सत्ता में बने रहने का अधिकार मिला है। इसके साथ ही यहां चुनाव और जनमत संग्रह भी अनिश्चित समय के लिए रोक दिए गए हैं। इस नए बिल में प्रावधान है कि देश में कोई चुनाव नहीं होगा। बिल में यह भी नहीं बताया गया है कि ये स्थिति कब खत्म होगी।

हंगरी में लम्बे समय तक कम्युनिस्ट शासन रहा था। 1989 में विक्टर ओरबन ने संसदीय व्यवस्था और संसदीय चुनावों की मांग कर बड़े प्रदर्शन और रैलियां की थीं। 1989 में ही हंगरी में कम्युनिस्ट शासन समाप्त हुआ और संसदीय व्यवस्था की स्थापना की गई। इसके नौ साल बाद 1998 में विक्टर ओरबन प्रधानमंत्री बन गए।  इस समय उनकी पार्टी को संसद में दो तिहाई बहुमत है। अब कोरोना वायरस की आड़ में उन्होंने इस बहुमत के बल पर हंगरी में संसदीय लोकतंत्र को ही खत्म कर दिया है।

भारत भी अब हंगरी की ही दहलीज पर खड़ा है। भारत में भी सत्ताधारी दल को संसद में दो तिहाई से ज्यादा बहुमत प्राप्त है। पार्टी और सरकार में अभी भी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी सर्व शक्तिमान की हैसियत बनाए हुए हैं। 1991 के बाद से देश में लागू नई उदारीकरण की नीतियों से पैदा हुआ खाया-अघाया मध्य और उच्च मध्य वर्ग उनका अंधभक्ति स्तर के राजनीतिक आधार में तब्दील हुआ है। आज यह वर्ग ज्यादा ही आत्ममुग्ध और आत्म केंद्रित है। इसके कारण इसके अंदर की मानवीय संवेदनाएं लगभग खत्म हो चुकी हैं। इस वर्ग को पिछले 10 वर्षों में योजनाबद्ध तरीके से एक उन्मादी भीड़ में तब्दील किया गया है। यह धार्मिक समानता की बात हो तो मुश्लिम, इसाई  विरोधी है। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बराबरी की बात हो तो दलित, आदिवासी, पिछड़ों का विरोधी है। राजनीतिक विचारधारा हो तो कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट, प्रगतिशील और लोकतंत्र पसन्द हर धारा के खिलाफ है। यह लोकतंत्र का विरोधी तथा पुलिसिया स्टेट और फौजी तानाशाही का समर्थक है। यह कानून, अदालत और संविधान का विरोधी है, तथा भीड़ द्वारा सड़क पर ही न्याय देने वाली बर्बर हिंसक कार्यवाही का पक्षधर है। वह सरकार और उसके मुखिया से सवाल पूछने को देशद्रोह मानता है।

वह कश्मीर की जमीन पर अपना अधिकार चाहता है पर कश्मीरियों को अपना दुश्मन मानता है। वह पूरे उत्तर पूर्व की जमीन को अपना बताता है, पर वहां के निवासियों से नफरत करता है और उन्हें बर्दाश्त नहीं करता है। वह पूरे दक्षिण भारत को अपनी ही सीमा मानता है, पर वहां के निवासियों की भाषा और संस्कृति को मिटा देना चाहता है। वह अपनी इस समझ को ही राष्ट्रवादी होना कहता है। उसकी इस समझ को बहुत ही सुनियोजित तरीके से और धीरज के साथ वर्षों में गढ़ा गया है। उसके लिए सत्ता के शिखर पर बैठा व्यक्ति उसका भगवान है। इस भगवान के हर आदेश को बिना सोचे, बिना सवाल किए लागू करना ही उसके लिए राष्ट्र की सच्ची सेवा है।

आरएसएस, बीजेपी और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भारत के मध्य-उच्च मध्यवर्ग की इस समझ का परीक्षण कई मौकों पर कर चुके हैं। इस परीक्षण की शुरुआत 25 वर्ष पहले गणेश की मूर्ति को दूध पिलाने से शुरू हुई और कई मौकों पर दोहराई गई। पर कोरोना जैसे संकट में जब पूरा देश मौत के भय से घरों में कैद है, इस बीच जब लोग सुबह से शाम तक सिर्फ रोजाना देश और दुनिया में हो रही मौतों का हिसाब गिन रहे हैं, तब भी अपनी मौत के डर से घरों में दुबके इस मध्य व उच्च मध्य वर्ग को अपने राजनीतिक जश्न के अभियान में उतार देने का उनका प्रयोग काफी सफल हो रहा है। मौतों की बढ़ती गिनती के बीच मनाए गए इस ताली-थाली और दीपावली जश्न को देख कर अब विश्वास हो गया है कि भारत में भी हंगरी की तरह जल्द ही संसदीय लोकतंत्र की पूर्ण विदाई होने वाली है। भारत में अब घोषित कारपोरेट फासीवादी हिंदू राष्ट्र का आगमन ज्यादा दूर नहीं। ऐसे समय में मानवता, लोकतंत्र, संविधान की रक्षा की लड़ाई को तेज करने के अलावा जिंदा कौमों के पास कोई अन्य रास्ता नहीं बचता है।