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भारतीय कृषि के सम्मुख चुनौतियां, भाग-3
October 29, 2019 • Purushottam Sharma

भारतीय कृषि के सम्मुख चुनौतियां, भाग-3

पुरुषोत्तम शर्मा

गतांक से आगे

घाटे की खेती
 
कृषि क्षेत्र में नव उदारवादी सुधारों से भारत में खेती घाटे का सौदा हो गयी है जिससे भारत का किसान कर्ज के जाल में फंस गया है. इसके कारण नई पीढी खेती से पूरी तरह विमुख हो रही है और शहरों में पूंजीपतियों के लिए सस्ते श्रम के बाजार का निर्माण कर रही है. नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन NSSO की 70 वीं राउंड रिपोर्ट के अनुसार 1 एकड़ से कम भूमि वाले किसान की मासिक आय 1308 और खर्च 5401 रुपया है. इसी तरह 5 एकड़ तक भूमि वाले किसान को आय और खर्च में 28.5 प्रतिशत का नुकसान है. भारत में उगाई जाने वाली 23 फसलों पर अध्ययन कर NSSO ने माना कि कुल लागत मूल्य में भारी बृद्धि किसानों की आय में गिरावट की जिम्मेदार है.
 
कर्ज में डूबा भारत का किसान 
 
एक अनुमान के अनुसार भारत के किसानों पर इस वक्त लगभग 11,00,000 करोड़ रुपए कर्ज है. भारत में 52 प्रतिशत किसान कर्ज में डूबा है. जिसमें से प्रति किसान पर औसत 47,000 रुपया कर्ज है. सर्वाधिक पंजाब में लगभग 3,00,000 रुपया, आंध्र प्रदेश में 1,23,400 रुपया और तेलंगाना में 93,000 रुपया प्रति खेतिहर किसान औसत कर्ज है.
 
बटाईदार किसानों को किसान का दर्जा नहीं
 
घाटे की खेती के कारण छोटा व मझोला किसान अपनी जमीन को बटाई या ठेके पर दे रहा है और खुद के लिए कोई और रोजगार तलास रहा है. गाँव में कल तक जो भूमिहीन व खेत मजदूर थे उनका बड़ा हिस्सा आज अपने पारिवारिक श्रम को लगाकर बटाई या ठेके पर खेती कर रहा है. आज भारत की 60 प्रतिशत खेती बटाई या ठेके पर हो रही है, पर इन बटाईदारों को किसान का दर्जा प्राप्त नहीं है. इसके कारण बैंक कर्ज, नुकसान का मुआवजा और एमएसपी पर फसल खरीद सहित किसानों को मिलने वाली सरकारी सुविधा से वास्तविक खेती करने वाला यह 60 प्रतिशत हिस्सा वंचित रह जाता है.
 
बीज, कीटनाशक के बाजार पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे से खेती में बढ़ी लागत
 
भारत में घाटे की खेती का मुख्य कारण खेती की लागत में लगातार हो रही बढोतरी है. भारत के बीज बाजार पर मोसांटो और करगिल जैसी देंत्याकार अमरीकी बीज कंपनियों का कब्जा होता जा रहा है. भारत दुनिया का 8वां बड़ा बीज बाजार है. बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां 1 अरब डॉलर से भी ज्यादा का कारोबार करती हैं. भारत के बीज उद्योग में कारपोरेट का दखल 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है. भारत के बीज बाजार के 75 प्रतिशत से ज्यादा पर इनका कब्जा हो चुका है. सन् 1967 में भारत में गेहूं की कीमत 76 रूपए प्रति क्विंटल और खेती के यंत्र में इस्तेमाल होने वाले लोहे की कीमत 65 रूपए प्रति क्विंटल थी. आज 53 वर्ष बाद भारत में गेहूँ की कीमत 1700 रुपए प्रति क्विंटल और लोहे की कीमत 5500 रुपए प्रति क्विंटल है. इन कंपनियों द्वारा उत्पादित टमाटर का बीज 40,000 रुपए किलो, गोभी का बीज 25 से 40 हजार रुपया किलो और शिमला मिर्च का बीज 1,00,000 रुपए किलो तक बेचा जा रहा है.