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भारतीय कृषि के सम्मुख चुनौतियां, भाग-7
November 4, 2019 • Purushottam Sharma

भारतीय कृषि के सम्मुख चुनौतियां, भाग-7

पुरुषोत्तम शर्मा

गतांग से आगे...

केरल में दूसरा बड़ा भूमि सुधार

1957 में केरल प्रदेश में चुनाओं के जरिये दुनिया की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार कामरेड नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में सत्ता में आई. सत्ता में आते ही इस सरकार ने राज्य में भूमि सुधार और शिक्षा में सुधार की बड़ी मुहीम को चलाया. राज्य के भूमिहीनों को खेती लायक उपयुक्त जमीनें आवंटित की गयी. किसानों, खेत मजदूरों के कर्ज माफ़ किए गए और जमींदारों की ताकत को कमजोर किया गया. शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधारशुरू हुए, स्कूलों में पढ़ाने का समय निर्धारित हुआ, निजी स्कूलों में अनिवार्य रूप से सरकारी पाठ्यक्रम चलाना व सरकार के नियमों की अवहेलना करने पर स्कूलों का अधिग्रहण इसके मुख्य कदम थे. इन दोनों क़दमों से परेशान राज्य के प्रभुत्व वर्ग ने बड़े पैमाने पर सरकार के खिलाफ आन्दोलन शुरू कर दिया. बाद में नेहरू सरकार ने 1959 में नम्बूदरीपाद सरकार को बर्खास्त कर दिया.

भूदान में मिली जमीनें और उनकी लूट

तेलंगाना आन्दोलन के बाद भी जमींदारी प्रथा के खात्मे और जमीनों के बटवारे के लिए देश भर में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में आन्दोलन चलते रहे. किसान आन्दोलन की इस आग को कुछ ठंडा करने के लिए सर्वोदयी नेता विनोवा भावे ने 1951 में भूदान आन्दोलन की शुरुआत की. इसके तहत उन्होंने देश भर में जमींदारों, राजे-रजवाड़ों से 47,63,617 एकड़ जमीन दान में ली. इसमें सर्वाधिक 21 लाख एकड़ से ज्यादा जमीनें संयुक्त बिहार से मिली थी. बिहार के जमींदारों ने 6,48,593 एकड़ और झारखंड के जमींदारों ने 14,69,280 एकड़ जमीनें विनोबा जी को दी थी. इनमें से ज्यादातर जमीनें आज तक भूमिहीनों को नहीं दी गई है. बिहार में मात्र 2,78,320 एकड़ जमीनें ही आज तक बंट पायी हैं, जबकि झारखंड में मात्र 4,88,735 एकड़ जमीनें ही भूमिहीनों तक पहुंच पाई हैं. इनमें भी उसका मालिकाना पट्टा आज तक अधिकतर लोगों को नहीं मिला है. अधिकतर जमीनों को दलालों और भ्रष्ट नौकरशाहों से लेकर भूदान समिति से जुड़े लोग अनफिट और बेकार जमीन घोषित किए हुए हैं और नदी-नाला व पहाड़ी जमीन के नाम पर ये जमीनें लूट की शिकार हो रही हैं.

जमींदारी उन्मूलन कानून के बावजूद जमींदारी प्रथा जारी 


जमींदारी उन्मूलन और सीलिंग कानूनों के बावजूद भारत में सत्ता के संरक्षण में सामंतों और बड़े जमींदारों का न सिर्फ बड़े पैमाने पर जमीनों पर एकाधिकार बना रहा, बल्कि ग्रामीण समाज और राज्यों की राजनीति पर भी उनका प्रभुत्व बना रहा. उत्तराखंड की तराई, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से लेकर बिहार के चम्पारण तक जो नेपाल की सीमा से सटे क्षेत्र हैं, आज भी सैकड़ों व हजारों एकड़ के बड़े फ़ार्म व इस्टेट मौजूद हैं.

कारपोरेट के पक्ष में भूमि सुधार को पलटने की प्रक्रिया शुरू

इस वक्त भारत में भूमि सुधार कानूनों को पलटने और खेती की जमीनों, आदिवासियों के जंगल और नदियों को बड़े कारपोरेट के कब्जे में पहुँचाने का अभियान जोर-शोर से जारी है. तमाम राज्य सरकारों के माध्यम से भूमि हदबंदी कानूनों को बदला जा रहा है. कृषि भूमि के गैर कृषि उपयोग पर लगे प्रतिबंधों को ख़त्म किया जा रहा है. अनुसूचित जातियों और जन जातियों की जमीनों को गैर जातीय लोगों को हस्तान्तरण पर लगी कानूनी रोकों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों-वनवासियों को उनके पुस्तेनी अधिकार की जमीनों पर मालिकाना हक़ देने वाला वनाधिकार कानून 2006 की अवहेलना कर बड़े पैमाने पर उन्हें उनकी जमीनों से बेदखल किया जा रहा है. भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के भारी आन्दोलन के दबाव में 2013 में बने भूमि अधिग्रहण कानून को निष्क्रिय किया जा रहा है. वर्षों से जन आंदोलनों के बल पर सरकारी जमीनों या ग्राम समाज व सीलिंग की जमीनों पर बसे भूमिहीन और गरीब किसानों को जमीन का मालिकाना हक़ देने के बजाए फिर से उजाड़ा जा रहा है.

विकास के नाम पर खेती की जमीनों का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण  

एक तरफ हमारी आबादी लगातार बढ़ रही है, दूसरी तरफ विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर खेती की जमीन का अधिग्रहण हो रहा है. एसीजेड के नाम पर लाखों एकड़ कृषि भूमि बड़े कारपोरेट के हवाले की गयी. देश के अन्दर 6 से 8 लेन के 1,455.4 किलोमीटर लम्बे 21 एक्सप्रेस वे बन चुके हैं और 7,491.1 किलोमीटर लम्बे 27 एक्सप्रेस वे निर्माणाधीन हैं. इसी तरह 6,672 किलोमीटर लम्बे चार क्षेत्रीय रेल कारीडोर और 3,360 किलोमीटर लम्बे दो रेल फ्रेट कारीडोर बन रहे हैं. इनके दोनों ओर लाखों एकड़ कृषि भूमि को औद्योगिक गलियारों और व्यवसायिक गतिविधियों के लिए अधिसूचित कर दिया गया है. इसी तरह राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य राजमार्गों के दोनों ओर भी लाखों एकड़ जमीन को व्यवसायिक घोषित कर दिया गया है. हजारों किलोमीटर लम्बी गैस पाइप लाइनें बिछाई जा रही हैं. तमाम राज्य सरकारें कारपोरेट को सहजता से भूमि उपलब्ध कराने के लिए लाखों एकड़ भूमि के भूमि बैंक बना रही हैं. इन भूमि बैंकों में कृषि भूमि के अतिरिक्त ग्राम समाज, सीलिंग व सरकार की उन जमीनों को शामिल किया जा रहा है, जिन्हें देश के भूमिहीनों, ग़रीबों में बांटा जाना था.

जारी....