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भारतीय कृषि के सम्मुख चुनौतियां, भाग-8
November 5, 2019 • Purushottam Sharma

भारतीय कृषि के सम्मुख चुनौतियां, भाग-8

पुरुषोत्तम शर्मा

गतांग से आगे .. अंतिम क़िस्त

 

पहाड़ व जंगल में रहने वालों की बेदखली

आदिवासी-वनवासी क्षेत्रों में खनिज व वन संपदा से भरपूर आदिवासियों और वन विभाग की लाखों एकड़ जमीनें बड़े कारपोरेट को दी जा रही हैं. पर्वतीय क्षेत्रों में नदी घाटी की उपजाऊ जमीनों को विद्युत् परियोजनाओं के नाम पर कारपोरेट के हवाले किया जा रहा है. राष्ट्रीय पार्कों और वन विहारों के साथ ही ईको संसिटिव जोन के नाम पर उन परम्परागत पर्वतीय लोगों, वन वासियों और आदिवासियों को जबरन उनके गावों व जमीनों से बेदखल किया जा रहा है, जो सदियों से इन वनों और ईको सिस्टम को बचाए रखने के मजबूत स्तम्भ रहे हैं. इन क्षेत्रों में सत्ता के संरक्षण में कारपोरेट की पहुँच ने हमारे पर्यावरण और ईको सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है.

देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में

हमारी सरकार कारपोरेट परस्त नीति पर चल रही है. खेती करने वाले किसानों, आदिवासियों, वनवासियों के हाथ से जमीनें निकलती जा रही हैं. यह हमारी बढ़ती आबादी के सामने खाद्य सुरक्षा का बड़ा ख़तरा खड़ा कर देगा. खेती में बढ़ते मशीनीकरण के प्रयोग से और पशुपालन व ग्रामीण दस्तकारी पर हुए हमले से गांवों में बड़े पैमाने पर रोजगार घटा है. इतनी बड़ी आबादी को खेती और उनके आजीविका के परम्परागत साधनों से बेदखल करने के बाद उन्हें आजीविका का दूसरा साधन देने के लिए हमारी सरकारों के पास कुछ भी नहीं बचा है.

सामन्ती अवशेषों के साथ सामंजस्य बिठाते हुए कारपोरेट पूंजी का बढ़ता नियंत्रण

भारत के आर्थिक जीवन में सामन्ती अवशेषों के साथ सामंजस्य बिठाते हुए कारपोरेट पूंजी का नियंत्रण बढ़ रहा है. कारपोरेट पूंजी का यह नियंत्रण आर्थिक क्षेत्र के साथ ही राज्य की संस्थाओं और संसदीय लोकतंत्र में भी बढ़ा है. भारत की खेती और कृषि में बड़ी और कारपोरेट पूंजी की पहुँच बड़े पैमाने पर बढ़ी है. पर बड़ी पूंजी की यह पहुँच ग्रामीण समाज में मौजूद सामन्ती अवशेषों को ख़त्म किए बिना और वहाँ उत्पादन संबंधों को बदले बिना हुई है. यह स्थितियां बड़ी पूंजी और साम्राज्यवाद को सस्ते श्रम और कच्चे माल का आसान बाजार उपलब्ध कराती हैं. यही नहीं यह भारतीय समाज में जातियों और सामंती संबंधों को भी टिकाए रखने का आधार देती हैं. यह उत्पादक शक्तियों के विकास में बाधक है और भारतीय सामाज व राजनीति के व्यापक लोकतान्त्रीकरण की प्रक्रिया को रोके है. 

जनता का जनवाद व समाजवाद ही विकल्प है

भारत का वर्तमान कृषि संकट इतना गहरा गया है कि वर्तमान शासक वर्ग के पास उसके समाधान का कोई रास्ता नहीं बचा है. इस कृषि संकट के

समाधान के लिए खेती के कारपोरेटीकरण के जिस रास्ते पर भारत आज बढ़ रहा है, वह हमारी खेती किसानी की तबाही का रास्ता है. हमारी आधी से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है. अपनी बढ़ती आबादी की खाद्य व आजीविका की जरूरतों को पूरा करने, देश में उपलब्ध प्राकृतिक व मानवीय संशाधनों के जनपक्षीय उपयोग और मुकम्मल भूमि सुधार के लिए इन साम्राज्यवाद परस्त, कारपोरेट परस्त नीतियों को उलटना जरूरी है. हम समझते हैं कि खेती किसानी के इस संकट से बाहर निकलना व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव के बिना संभव नहीं है. यह एक सच्चे जनता के  जनवादी भारत के निर्माण और फिर समाजवाद के रास्ते ही संभव है. 

कामरेडों! मुझे लगता है कि हम सब दुनिया भर में कृषि क्षेत्र में लगभग एक से संकट का सामना कर रहे हैं. नव उदारीकरण की नीतियों के कारण हमारी खेती पर साम्राज्यवाद और कारपोरेट के हमले के खिलाफ लड़ाई के लिए हमें एकजुट होना होगा. हर देश में चल रहे प्रगतिशील किसान आंदोलनों के बीच एक साझा समझ को विकसित करना होगा. नेपाल के कामरेडों और यहाँ के राष्ट्रीय किसान आयोग ने हम सब को मिलाकर इस दिशा में जो पहल की है, मैं उसके लिए उनको एक बार फिर धन्यवाद देता हूँ.    

                                                         लाल सलाम !