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चिपको आंदोलन का गुमनाम प्रमुख योद्धा गोविंद सिंह रावत
June 5, 2020 • Delhi • लेख

 

गोविन्द सिंह रावत!-- पद यात्रा, पीले पोम्प्लेट और एक चेलेंजर से गांव गांव लोगो को दिया था पर्यावरण संरक्षण का संदेश...

(पर्यावरण दिवस-5 जून विशेष)

ग्राउंड जीरो से-- संजय चौहान!

(रेखांकन- विनय रावत)

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। पर्यावरण संरक्षण के लिए चिपको आंदोलन ने पूरे विश्व को अनोखा मंत्र दिया था। इस आन्दोलन ने पूरे विश्व को दिखा दिया की पहाड़ की मात्रृशक्ति यदि ठान ले तो उसके लिए कोई भी कार्य मुश्किल नहीं है। इस बात से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता है की चिपको को मुकाम तक पहचानें में चिपको नेत्री गौर देवी, बाली देवी, रैणी- रिगडी गांव की समस्त महिला मंगल दल के सदस्यों सहित धौली गंगा के दर्जनों गांव के लोगों का योगदान रहा है। साथ ही चंडी प्रसाद भट्ट, हयात सिंह बिष्ट, आलम सिंह बिष्ट, वासुवानंद नौटियाल सहित कई लोगों ने इसे मंजिल तक पहुचाने में अहम् भूमिका अदा की। बेहद अल्प समय में चिपको ने जो सफलता प्राप्त की उसने सारे विश्व को अचंभित कर दिया था। वर्तमान समय में चिपको की प्राशांगिकता पहले से कई अधिक है।

लेकिन इन सबके बीच जिस व्यक्ति की बदौलत आज पर्यावरण संरक्षण का चिपको आंदोलन विश्व मानचित्र पर अपनी चमक बिखेरे हुये है। चिपको का वही सारथी आज दुनिया की नजरों से ही दूर है। चिपको के सबसे बड़े सारथी गोविन्द सिंह रावत के बिना चिपको आन्दोलन की गाथा अधूरी है। लीजिये विश्व पर्यावरण दिवस पर इस गुमनाम योद्धा की संघर्षों की कहानी। देश की दूसरी रक्षा पंक्ति के रूप में प्रसिद्ध सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ ब्लाक के नीति घाटी के कोषा गांव में 23 जून 1935 को चंद्रा देवी और उमराव सिंह रावत के घर एक बालक ने जन्म लिया। माता पिता ने बालक का नाम गोविन्द सिंह रावत रखा।

बचपन से ही बिलक्षण प्रतिभा के धनी गोविन्द सिंह रावत का जीवन बेहद कठिनाइयों और संघर्षों में व्यतीत हुआ। जब वे महज 4 साल के थे तो उनकी माता इस दुनिया से उन्हें छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए चली गई। इस घटना ने गोविन्द सिंह को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। पारिवारिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वे 10 सालों तक स्कूल नहीं जा पाये थे। जैसे तैसे उन्होंने कुछ पढाई गांव में फिर 8 वीं तक की पढाई नंद्रप्रयाग से ग्रहण की। जिसके बाद आगे की पढाई बीच में ही छूट गई। लेकिन मन ही मन में पढने की ललक कौंधती रही और मन विद्रोह को आतुर हो उठा। इसी बीच पिताजी व्यापार के लिए तिब्बत चले गए ( उन दिनों भारत- तिब्बत का ब्यापार नीति दर्रे से होता था)।

मौके को अनुकूल पाकर वे घर छोड़कर पौड़ी के बुआखाल आ गये। जहां इन्होने फलों की एक छोटी दुकान खोल दी। कुछ दिनों के बाद इन्होने पास के ही मेस्मोर इंटर कॉलेज में अपना दाखिला किसी तरह से करवा दिया। परिणामस्वरूप 10 वी की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। जिसके बाद फिर बुआखाल में दुकान खोल दी। लेकिन इस बार फलों की नहीं बल्कि पान की। आगे की पढाई करने के लिए पौड़ी टोल पोस्ट पर 15 रूपये महीने में नौकरी भी शुरू कर दी और छोटे बच्चों को पढ़ना भी शुरू किया। धुन के पक्के गोविन्द सिंह को गहरा झटका तब लगा जब वे इंटर के पहले साल में ही फेल हो गये। जिसके बाद उन्होंने मेहनत की और 1960 में 25 साल की उम्र में इंटर पास किया। 12 वी पास करने के तत्काल बाद चमोली में पटवारियों के पद निकले और गोविन्द सिंह परीक्षा पास करके 1963 में पटवारी बन गए।

इसी बीच तिब्बत ब्यापार भी बंद हो गया। गोविन्द सिंह का मन नौकरी में नहीं लगा। 1964 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। पौड़ी में पढाई के दौरान उनकी मुलाकात वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली जैसे कई अन्य लोगो से हुई थी। जिनके विचारों का उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उन्हें भी समाज को समझने और किताबों को पढने शौक लग गया और धीरे धीरे इसी शौक ने उन्हें जीवन में लोगों के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी। उनका झुकाव सीपीआई की तरफ रहा इसलिए उन्होंने 1969 को इसे ज्वाइन कर लिया। जिसके बाद उन्होंने पीछे मुड कर नहीं देखा जनहित से जुडे छोटी बड़ी समस्याओं के निराकरण के लिए उन्होंने लोगों को एकत्रित करना शुरू कर दिया।

इसी बीच चुनाव के दौरान उन्हें अपने जनपद को करीब से जानने का मौका मिला, २ फरवरी 1973 को उन्हें जोशीमठ ब्लाक का पहला ब्लाक प्रमुख चुना गया। इस दौरान मलारी सडक मार्ग निर्माण में लोगों की कृषि योग्य भूमि काटी गई थी लेकिन मुवाआजा नहीं मिला था, गोविन्द सिंह ने भूमि मुवाआजा दिलाने के लिए शासन-प्रसाशन से मांग की, साथ ही बद्रीनाथ दौरे पर आई तत्कालीन गढ़वाल कमीशनर कुसुमलता मित्तल से भी परिचर्चा की, जिसके लिए वे कमीशनर से भी भिड़ गए और उनका घेराव कर दिया। कमिश्नर के जबाब – जानते हो हम कमिश्नर हैं के उत्तर में – कमिश्नर जी हम भी जनता है,--- की यादें आज भी लोगों के जेहन में तरोताजा है।

इसी दौर में गढ़वाल में जंगलों को काटने का ठेका दे दिया था। रामपुर-फाटा से लेकर मंडल और रैणी के जंगलो के पेड़ों को काटने का ठेका साइमन एंड गुड्स कम्पनी को दे दिया गया था। जंगल काटने को लेकर पूरे गढ़वाल में लोगों में असंतोष हर जगह था। अपैल 1973 में श्रीनगर में आयोजित श्रीनगर गोष्टी में उन्हें इसके बारे में विस्तार से पता चला। इस गोष्टी में चंडी प्रसाद भट्ट ने उन्हें बताया की रैणी का जंगल भी 4 लाख 71 हजार में बिक चुका है। इसको बचाने की सोचो। जिसके बाद इन दोनों ने आपस में परिचर्चा कर पेड़ों को बचाने के लिए रणनिति तैयार की। पहले मंडल के जंगलों को काटने के खिलाफ़ आवाज बुलंद की और फिर रामपुर फाटा के जंगलो को काटने के खिलाफ़ सफलता प्राप्त हुई।

मई में गोपेश्वर में जंगलों को कटने से बचाने के लिए एक वृहद सम्मलेन आयोजित हुआ जिसमे गोविन्द सिंह ने सबको बड़े गौर से सुना और उस पर मंथन भी किया, जिसकी परणीती यह हुई की रात ही रात में एक पम्पलेट तैयार हो गया – जिसमे लिखा हुआ था – आ गया लाल निशान, लुटने वाले हो सावधान, लिपटो, झपटो और चिपको,-- सब की सहमति से अक्तूबर 1973 में पीले कागज में इसे लाल अक्षरों से छापा गया, जिसके बाद इन्होने जोशीमठ से लेकर रैणी के आस पास यानी की नीति घाटी के दर्जनों गांवो की पद यात्रा शुरू की और पीले पोम्प्लेट और एक चेलेंजर से लोगो को पेड़ बचाओ, पहाड़ बचाओ की बात कहने लगे।

जंगलों के खत्म होने पर होने वाले नुकसान से लेकर भूस्खलन, पानी, चारा के संकट की बात भी कही --चाहे कोई सुने या न सुने वो अपनी मुहीम को चलाते रहे, इस दौरान शुरू शुरु में तो कई लोगों ने उन्हें पागल तक समझा, लेकिन धीरे धीरे लोगो को जंगल की अहमियत भी समझ में आने लगी, दिसम्बर 1973 में वे टिहरी एक सम्मेलन में शिरकत होने गए जहा उन्होंने लोगो को चमोली में लगों को जंगल बचाने की मुहीम के बारे में विस्तार से बताया और लोगों को जागरूक होने को कहा। दिसम्बर 1973 से लेकर मार्च तक उन्होंने लोगो को रैणी के जंगल को बचाने के लिए लोगो को जागरूक किया।

गोविन्द सिंह रावत की ये मुहीम उस समय काम आई जब 14 साल से अटके मुवाआजे को प्रशासन की सोची समझी रणनीति के तहत रैणी के पुरुषो को 26 मार्च 1974 को चमोली तहसील बुलाया गया और साइमन गुड्स के मजदूरों ने रैणी के जंगलों में धावा बोल दिया। जिसके प्रतिकार में गौरा देवी की अगुवाई में महिलाओं ने अपने हरे भरे जंगल को बचाने के लिए अनोखा रास्ता अपनाया और पेड़ों से चिपक गई। महिलाओं के होंसलों के आगे मजदूरों ने हार मानी और वापस लौट गये। इस प्रकार गोविन्द सिंह रावत द्वारा लोगो को जंगल बचाने का जो संदेश गांव - गांव जाकर दिया गया था वो आखिरकार काम आ गया।

भले उस दिन गोविन्द सिंह और अन्य लोग रैणी में न रहें हो लेकिन उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है, जिसके बाद चिपको की जीत पर जोशीमठ में एक विशाल जुलुस भी निकाला गया। चिपको की सफलता के बाद रैणी जांच समिति बनी जिसमें चंडी प्रसाद भट्ट और गोविन्द सिंह रावत दोनों को सदस्य बनाया गया। जिनके संस्तुतियों के आधार पर जंगलों का कटान रोक दिया गया, जो चिपको आन्दोलन की जीत थी। चिपको की सफलता के बाद चिपको रैणी से निकलर देश दुनिया में चमक बिखेरने लगा और गोविन्द सिंह चिपको से इतर छीनो-झपटो में लग गए।

1 फरवरी 1978 तक वे ब्लाक प्रमुख रहे। 1980 में बनाये गए वन अधिनयम के विरोध में भी वे खुलकर आगे आये। 19 नवम्बर 1988 को वो दुबारा जोशीमठ के ब्लाक प्रमुख चुने गए, और दिसम्बर 1996 तक इस पद पर बने रहे। अलग राज्य निर्माण के आन्दोलन में भी उन्होंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। जिसमे उन्होंने अलग राज्य आन्दोलन को लेकर बद्रीनाथ से लेकर ऋषिकेश तक कई मर्तबा दिवार लेखन भी किया। वे तामउम्र पहाड़ के हितों के लिए लड़ते रहे। कुछ सालों पहले गोविंद सिंह रावत के साथी रहे हुकुम सिंह रावत से चिपको आंदोलन में गोविंद सिंह रावत की भूमिका पर लंबी परिचर्चा हुई। वे कहते है की उनके जैसा सरल, कर्मठ, जुझारू और निस्वार्थ व्यक्ति आज शायद ही कहीं मिले।

लोगों की मांगों के लिए वे जोशीमठ में एक पत्थर पर बैठकर घंटों चेलेंजर से अवगत कराते थे। ब्लाक प्रमुख रहते हुये भी उन्होंने कभी भी अपने लिए कुछ नहीं किया। जिसकी बानगी उस समय उनके घर में जाकर देखि जा सकती थी। बिल्कुल सामान्य जीवन, उनके जीवन का एक ही उद्देश्य था की लोगों की समस्याओं को कैसे दूर किया जा सके। हुकुम सिंह रावत जी आगे कहते हैं की बस एक ही कमी थी। एक लक्ष्य पूरा होते ही दूसरे लक्ष्य को पाना। जिस चिपको की सफलता ने दुनिया को हैरत में डाला, उसकी सफलता को उन्होंने कभी भी भुनाया नहीं बल्कि चिपको की सफलता के बाद दूसरे कार्यो की और मुड गए।

तभी तो आज चिपको की चमक में जोशीमठ का गोविन्द सिंह रावत देश और दुनिया की नजरों से दूर है। जीवनपर्यंत लोगों के लिए लड़ने वाले गोविन्द सिंह रावत 21 दिसम्बर 1998 को दुनिया को छोड़ कर चल बसे और अपने पीछे छोड़ चले चिपको की अनमोल दास्तान। वास्तव में अंग्वाल से लेकर चिपको का सफर बहुत जादुई भरा रहा हो लेकिन इसको सफल बनाने में कई लोगों का हाथ रहा है, जिसमें गोविन्द सिंह रावत का योगदान अमूल्य है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता है।

विश्व पर्यावरण दिवस के बहाने एक बार फिर चिपको आंदोलन के गुमनाम योद्धा गोविंद सिंह रावत को शत शत नमन।