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दिल्ली दंगों पर एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट-दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल
August 30, 2020 • Delhi • लेख
दिल्ली दंगों पर एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट-दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल
 
रिपोर्ट में लिखा गया है कि जब पीड़ितों ने 100 नंबर पर फोन किया तो पुलिस की ओर से कहा गया- "आज़ादी चाहिए थी न, अब ले लो आज़ादी।" रिपोर्ट में बेज़ा तरीक़े से लोगों को हिरासत में रखने और कानून के मुताबिक समय पर मजिस्ट्रेट के सामने पेश न करने की घटनाओं का ब्योरा है। कुछ मामलों में पीड़ित की मौत भी हुई है। ऐसे लोगों का भी ब्योरा है जिन्होंने साफ़ कहा है कि पुलिस ने उनसे जबरन झूठे बयान दिलवाये और कोरे काग़ज़ पर दस्तखत करवाये। 8 जुलाई को उस पुलिस आर्डर का भी जिक्र है जिसमें लिखा था कि "दिल्ली दंगों से जुड़ी गिरफ़्तारियों में खास ख्याल रखने की जरूरत है ताकि हिंदू भावनाएँ आहत न हों।" 
 
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशन की ताजा रिपोर्ट में फरवरी में हुए दिल्ली के दंगों के लिए दिल्ली पुलिस पर जिस तरह उँगली उठायी गयी है, उसकी चर्चा पूरी दुनिया में है। भारत का कथित मुख्यधारा मीडिया इस रिपोर्ट पर चर्चा करने से चाहे कन्नी काट रहा हो, लेकिन अमेरिका से लेकर यूरोप तक के अख़बारों में इस रिपोर्ट की चर्चा है जिसने पेशेवर छवि वाली दिल्ली पुलिस के साथ-साथ भारत सरकार की साख को भी कमज़ोर किया है। अमेरिका के प्रमुख अख़बार वाशिंगटन पोस्ट ने भी इसे प्रमुखता से छापा है।
 
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने दंगों को रोकने में कोई रुचि नहीं दिखायी। यही नहीं फोन पर मदद की गुहार लगाने वालों की भी सुनवायी नहीं की। यहाँ तक कहा गया कि पीड़ित लोगों को अस्पताल तक पहुँचने से रोकने की भी दिल्ली पुलिस ने कोशिश की। यही नहीं निशाना बनाते हुए मुसलमानों के साथ मारपीट भी की। एमनेस्टी ने आश्चर्य जताया है कि दिल्ली पुलिस पर मानवाधिकार उल्लंघन का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ जबकि दंगा पीड़ितों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाइयाँ की गयी हैं। ज़ाहिर है, यह सब सत्ता के संरक्षण में हुआ।
 
एमनेस्टी इंटरनेश्नल के एक्ज़िक्यूटिव डायरेक्टर अविनाश कुमार कहते हैं कि “सत्ता की तरफ़ से मिल रहे इस संरक्षण से तो यही संदेश जाता है कि क़ानून लागू करनेवाले अधिकारी बिना जवाबदेही के मानवाधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं. यानी वो ख़ुद ही अपना क़ानून चला सकते हैं।” रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दिल्ली पुलिस का पक्ष जानने की कोशिश की गयी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। कुछ समय पहले दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने भी दंगों के बारे फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की थी जिसमें पीड़ितों ने पुलिस पर एफआईआर दर्ज न करने, समझौता करने के लिए धमकाने और पीडि़तों को उल्टा अभियुक्त बनाने की शिकायत की थी। आयोग के मुताबिक साज़िश के तहत दिल्ली पुलिस ने मुसलमानों को निशाना बनाया था। आयोग के सवालों का जवाब भी दिल्ली पुलिस ने नहीं दिया था। दुनिया भर में इस सिलिसले में मीडिया रिपोर्ट्स छपी थीं।
 
एमनेस्टी की रिपोर्ट में सीएए विरोधी आंदोलन के समय से दिल्ली पुलिस की भूमिका की पड़ताल की गयी है। साथ ही जामिया से लेकर जेएनयू के छात्रों के साथ हुई मारपीट का ब्योरा दर्ज है। एबीवीपी के हमलावरों का वीडियो सार्वजनिक होने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की। जबकि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ तुरंत ही एफआईआर दर्ज कर ली गयी थी। रिपोर्ट में बीजेपी नेताओं के चुनावी रैलियों में दिये गये भड़काऊ भाषणों का भी जिक्र है।
 
रिपोर्ट में लिखा गया है कि जब पीड़ितों ने 100 नंबर पर फोन किया तो पुलिस की ओर से कहा गया- “आज़ादी चाहिए थी न, अब ले लो आज़ादी।” रिपोर्ट में बेज़ा तरीक़े से लोगों को हिरासत में रखने और कानून के मुताबिक समय पर मजिस्ट्रेट के सामने पेश न करने की घटनाओं का ब्योरा है। कुछ मामलों में पीड़ित की मौत भी हुई है। ऐसे लोगों का भी ब्योरा है जिन्होंने साफ़ कहा है कि पुलिस ने उनसे जबरन झूठे बयान दिलवाये और कोरे काग़ज़ पर दस्तखत करवाये। 8 जुलाई को उस पुलिस आर्डर का भी जिक्र है जिसमें लिखा था कि “दिल्ली दंगों से जुड़ी गिरफ़्तारियों में खास ख्याल रखने की जरूरत है ताकि हिंदू भावनाएँ आहत न हों।”
 
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने रिपोर्ट जारी करने के साथ यह माँग भी की है कि दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की जाँच हो, जवाबदेही तय की जाये और पुलिस को सांप्रदायिक तनाव और हिंसा के दौरान सही ढंग से काम करने का प्रशिक्षण दिया जाये। गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली पुलिस की तारीफ़ की थी कि उसने 36 घंटों में दंगों पर काबू पा लिया। लेकिन रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली पुलिस ने भेदभावपूर्ण तरीके से काम किया और लोगों के मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन किया। दंगे में 53 लोगों की जान गयी थी।
 
एमनेस्टी की इस रिपोर्ट को दुनिया भर के अख़बारों ने प्रमुखता से छापा है। भारत की हिंदुत्ववादी सरकार के मुस्लिम विरोधी होने के आरोप के प्रमाण के तौर पर इस रिपोर्ट को पेश किया जा रहा है। वैसे भारत का कथित मुख्यधारा मीडिया, खासतौर पर टीवी चैनल इस पर चर्चा या बहस करते नहीं दिखते। उनका हर दिन सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी को समर्पित है।
 
मीडिया विजिल से साभार