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कामरेड रामनरेश राम: किसानों की मुक्ति के लिये प्रतिबद्ध क्रांतिकारी कम्युनिस्ट
October 26, 2019 • Purushottam Sharma

जन्मदिन पर विशेष

कामरेड रामनरेश राम: किसानों की मुक्ति के लिये प्रतिबद्ध क्रांतिकारी कम्युनिस्ट

किसान-मजदूरों, दलित-वंचित-उत्पीडि़त समुदायों और लोकतंत्र-पसंद लोगों के प्यारे नेता, 60 के दशक के लोकप्रिय मुखिया और 1995 से लगातार तीन बार विधायक रहने वाले अत्यंत ईमानदार और जनप्रिय विधायक का. रामनरेश राम का पूरा जीवन एक प्रतिबद्ध क्रांतिकारी कम्युनिस्ट का जीवन था।

1924 में जन्मे का. रामनरेश राम जब मिडिल स्कूल में पढ़ रहे थे, तभी 1942 का आंदोलन हुआ। उसी साल 15 सितंबर को भोजपुर के लसाढ़ी गांव में आंदोलनकारियों की तलाश में गए ब्रिटिश हुकूमत के सैनिकों का किसानों ने परंपरागत हथियारों के साथ प्रतिरोध किया और उनकी मशीनगन की गोलियों से शहीद हुए। का. रामनरेश राम उन शहीद किसानों को कभी भूल नहीं पाए। स्कूल की पढ़ाई छूट गई और वे आंदोलन का हिस्सा बन गए। उसके कुछ वर्षों बाद ही तेलंगाना का किसान विद्रोह हुआ, उसके नेतृत्वकारी बालन और बालू की फांसी की खबर और आंदोलनकारियों पर लादे गए फर्जी मुकदमों के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए फंड जुटाने के लिए की गई कम्युनिस्ट पार्टी की अपील उन तक पहुंची और वे फंड जुटाने के कार्य में लग गए।

1951 में का. रामनरेश राम को कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता मिली। उन्हें शाहाबाद जिला कमिटी का सदस्य बनाया गया। उन्हें किसानों के बीच काम करने की जिम्मेवारी मिली। बिहार सरकार ने जब सिंचाई रेट में दुगनी वृद्धि की, तो 10 मार्च 1954 को उसके विरुद्ध एक बड़ा प्रदर्शन कम्युनिस्ट पार्टी ने संगठित किया। 1965 में का. रामनरेश राम एकवारी ग्राम पंचायत के मुखिया चुने गए। मुखिया के रूप में वे इतने लोकप्रिय हुए कि उनके इलाके के किसान-मजदूर अंत-अंत तक उन्हें मुखियाजी कहकर ही संबोधित करते रहे। 1967 में जब वे सहार विधान सभा से सीपीआई-एम के उम्मीदवार के बतौर चुनाव लड़ रहे थे, तभी उनके चुनाव एजेंट जगदीश मास्टर पर सामंतों ने जानलेवा हमला किया। उसके बाद ही सामंती शक्तियों और राज्य तंत्र के गठजोड़ के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष शुरू हुआ।

भोजपुर में सामंती सामाजिक ढांचे और उसकी हिमायत में खड़े राजनीतिक तंत्र के खिलाफ संग्राम छिड़ गया। रामनरेश राम, जगदीश मास्टर, रामईश्वर यादव समेत सभी नेतृत्वकारियों को भूमिगत होना पड़ा। तब तक 1967 का नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह हो चुका था और भोजपुर का किसान आंदोलन उस आंच से सुलग उठा था। एक नई कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा-माले का जन्म हो चुका था। भोजपुर किसान आंदोलन के नेतृत्वकारी उसमें शामिल हो चुके थे। शासकवर्ग ने इस आंदोलन को कुचल देने के लिए भीषण दमन का सहारा लिया। का. रामनरेश राम के सहयोद्धा का. मास्टर जगदीश और का. रामेश्वर यादव शहीद हो गए। भाकपा-माले के दूसरे महासचिव का सुब्रत दत्त भी पुलिस के साथ मुकाबला करते हुए शहीद हुए। बुटन मुसहर, रामायण राम, नारायण कवि, शीला, अग्नि, लहरी समेत कई कम्युनिस्ट कार्यकर्त्ताओं ने एक नए राज-समाज के लिए संघर्ष करते हुए अपनी शहादत दी।

शोक और धक्के को झेलते हुए का. रामनरेश राम सर्वहारा की दृढ़ता और जिजीविषा के साथ अपने शहीद साथियों के सपने को साकार करने में लगे रहे। का. स्वदेश भट्टाचार्य और भाकपा-माले के तीसरे महासचिव का. विनोद मिश्र और अपने अनेक साथियों के साथ उन्होंने भोजपुर के किसान-मजदूरों को संगठित करने का काम जारी रखा। उन्होंने भाकपा-माले के संस्थापक महासचिव का. चारु मजुमदार की इस बात को आत्मसात कर लिया था कि जनता की जनवादी क्रांति जरूरी है, जिसकी अंतर्वस्तु कृषि क्रांति है। अस्सी के दशक में उन्हें भाकपा-माले के बिहार राज्य सचिव की जिम्मेवारी मिली। इसके पहले बिहार प्रदेश किसान सभा का निर्माण हो चुका था। का. रामनरेश राम, स्वतंत्रता सेनानी और जनकवि का. रमाकांत द्विवेदी 'रमता' और कई अन्य नेताओं ने बिहार प्रदेश किसान सभा का गठन किया, जो अब अखिल भारतीय किसान महासभा में समाहित हो चुका है।

कामरेड रामनरेश राम भाकपा(माले) के पोलितब्यूरो सदस्य एवं बिहार विधानसभा में भाकपा(माले) विधायक दल के नेता थे. का. रामनरेश राम जब विधायक बने, तो उन्होंने सिंचाई के साधनों को बेहतर बनाने की हरसंभव कोशिश की। मुकम्मल भूमि सुधार और खेत मजदूरों, बंटाईदार और छोटे-मंझोले किसानों के हक-अधिकार के लिए सदैव मुखर रहे। विधायक बनने के बाद उन्होंने 1942 के शहीद किसानों की याद में एक भव्य स्मारक बनवाया। किसान विद्रोहों और आंदोलनों के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था। उनके लिए 1857 का जनविद्रोह किसानाें के बेटों द्वारा किया गया विद्रोह था। वे ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बिहार में किसान आंदोलन की शुरूआत करने में स्वामी सहजानंद सरस्वती की अहम भूमिका को मानते थे। जीवन के अंतिम वर्षों में का. रामनरेश राम बदले हुए दौर में किसान आंदोलन पर एक किताब लिखना चाहते थे, जो संभव नहीं हो पाया। 26 अक्टूबर 2010 को उनका निधन हो गया।