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खिलजी की वापस - राजेश जोशी
January 12, 2020 • Delhi • कविता/गीत

खिलजी की वापस

राजेश जोशी

मुझे पहले ही समझ जाना चाहिए था
विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में जब ख़ामोशी से पढ़ते हुए
छात्रों पर अचानक पुलिस ने लाठियाँ भाँजना शुरू किया
और किताबों को फाड़ डाला....
मुझे तो तब ही इलहाम हो जाना चाहिए था
कि बख्तियार खिलजी लौट आया है।

याद होगा तुम्हें बख्तियार खिलजी जब नालंदा विश्वविद्यालय में
तुम्हारी फौजों ने धावा बोला और उसमें आग लगा दी
महीनों तक जलती रहीं और खाक हो गयीं
अद्वितीय ज्ञान की किताबें
इल्म से लगता है तुम्हारी पुरानी दुश्मनी है बख्तियार खिलजी
इल्म से तुम इतना डरते क्यों हो?

देर से ही सही पर मैंने भाँप ही लिया
कि हो ना हो सदियों बाद एक बार फिर
तुम वापस लौट आए हो बख्तियार खिलजी

तुमने लेकिन अपना नाम क्यों बदल लिया बख्तियार खिलजी
और नाम तो नाम तुमने तो अपना मजहब भी बदल डाला!

लेकिन एक बात कहूँ बख्तियार खिलजी
वक़्त बदल चुका है
यह नालंदा विश्वविद्यालय नहीं है
यहाँ छात्र ख़ामोशी से सब कुछ बर्दाश्त नहीं करते
आईने तोड़ने से कुछ हासिल नहीं होगा बख्तियार खिलजी
अब तो जलाने से भी ख़त्म नहीं होती किताबें
तुम मूर्ख तो पहले भी थे लेकिन अब
पहले से ज़्यादा बदसूरत भी हो गए हो बख्तियार खिलजी।