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कोरोना काल में चर्चा में आई मनरेगा और उससे जुड़े अनुभव
July 17, 2020 • Delhi • लेख

कोरोना काल में चर्चा में आईं मनरेगा और उससे जुड़े अनुभव

डा० राजेंद्र कुकसाल

आजकल सोशल मीडिया पर मनरेगा चर्चाओं में हैं, हासिये पर चल रही यह योजना अचानक सुर्खियों में आ गयी, क्योंकि हुक्मरानों को इस योजना के माध्यम से बेरोजगार प्रवासियों के लिए रोजगार की संभावनाएं दिखाई देने लगी। समय-समय पर मैं मनरेगा योजना से जुड़ा रहा । उत्तराखण्ड राज्य में चल रही मनरेगा योजना पर अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा कर रहा हूं।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, जिसे भारत सरकार ने 7 सितंबर 2005 को पार्लियामेंट से पास करा कर कानूनी दर्जा दिया गया। यह योजना दो फरवरी, 2006 को देश के 200 जिलों में शुरू की गयी अगले बर्ष याने 2007 में इसे और 130 जिलों में विस्तारित किया गया वर्ष 2008-09 में पहली अप्रैल से यह देश के सभी 593 जिलों में लागू की गयी।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक कानून है, जो शासन को इस बात के लिए बाध्य करता है कि वह किसी भी ग्रामीण परिवार के वैसे सदस्यों को एक साल में सौ दिन का रोजगार मुहैया कराये, जो 18 साल की उम्र पूरी कर चुके हैं और अकुशल मजदूर के रूप में काम करना चाहते हैं। इस अधिनियम को ग्रामीण लोगों की क्रय शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, मुख्य रूप से ग्रामीण भारत में रहने वाले लोगों के लिए अर्ध-कौशलपूर्ण या बिना कौशलपूर्ण कार्य, चाहे वे गरीबी रेखा से नीचे हों या ना हों।

शुरू में इसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) कहा जाता था, लेकिन 2 अक्टूबर 2009 को इसका पुनः नामकरण कर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना किया गया। सूखाग्रस्त क्षेत्रों और जनजातीय इलाकों में तथा कुछ राज्यों ने अपनी हिस्सेदारी से मनरेगा के तहत 150 दिनों के रोज़गार का प्रावधान रखा है। मनरेगा के तहत ग्रामीण परिवारों के वयस्क युवाओं को रोज़गार का कानूनी अधिकार प्रदान किया गया है।

प्रावधान के मुताबिक, मनरेगा लाभार्थियों में एक-तिहाई महिलाओं का होना अनिवार्य है। साथ ही विकलांग एवं अकेली महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। प्रावधान के अनुसार, आवेदन जमा करने के 15 दिनों के भीतर या जिस दिन से काम की मांग की जाती है, आवेदक को रोज़गार प्रदान किया जाएगा। पंचायती राज संस्थानों को मनरेगा के तहत किये जा रहे कार्यों के नियोजन, कार्यान्वयन और निगरानी हेतु उत्तरदायी बनाया गया है।

मनरेगा के तहत आर्थिक बोझ केंद्र और राज्य सरकार द्वारा साझा किया गया है। इस कार्यक्रम के तहत कुल तीन क्षेत्रों पर धन व्यय किया जाता है (1) अकुशल, अर्द्ध-कुशल और कुशल श्रमिकों की मज़दूरी (2) आवश्यक सामग्री (3) प्रशासनिक लागत। केंद्र सरकार अकुशल श्रम की लागत का 100 प्रतिशत, अर्द्ध-कुशल और कुशल श्रम की लागत का 75 प्रतिशत, सामग्री की लागत का 75 प्रतिशत तथा प्रशासनिक लागत का 6 प्रतिशत वहन करती है, वहीं शेष लागत का वहन राज्य सरकार द्वारा किया जाता है।

मनरेगा में मांग करने पर समय पर कार्य न उपलब्ध करा पाने की स्थति में श्रमिकों को राज्य सरकारों को बेरोजगारी भत्ता देने का प्राविधान है जिससे राज्य सरकारें श्रमिकों को समय पर रोजगार प्रदान करने के लिए बाध्य हो सकें। बेरोजगारी भत्ते की राशि को निश्चित करना राज्य सरकार पर निर्भर है, जो इस शर्त के अधीन है कि यह पहले 30 दिनों के लिए न्यूनतम मजदूरी के 1/4 भाग से कम ना हो और उसके बाद न्यूनतम मजदूरी का 1/2 से कम ना हो। प्रति परिवार 100 दिनों का रोजगार (या बेरोजगारी भत्ता) सक्षम और इच्छुक श्रमिकों को हर वित्तीय वर्ष में प्रदान किया जाना चाहिए।

मनरेगा के कार्य ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करने के उद्देश्य से निर्धारित किए जाते हैं। जैसे -जल संरक्षण और संचयन , वनीकरण, ग्रामीण संपर्क-तंत्र, बाढ़ नियंत्रण और सुरक्षा ,तटबंधों का निर्माण और मरम्मत, नए टैंक /तालाबों की खुदाई, रिसाव टैंक और छोटे बांधों के निर्माण को भी महत्व दिया जाता है। कोई भी ऐसा कार्य जिसे केन्द्र सरकार राज्य सरकारों से सलाह लेकर अधिसूचित करें। समय-समय पर राज्यों की मांग व आवश्यकता अनुसार इसमें भारत सरकार द्वारा सुधार किया जाता रहा है।

कोरोना काल में बड़ी संख्या में प्रवासियों के अपने राज्य व गांव लौटने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की चुनौती पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इस स्थति में मनरेगा के वार्षिक बजट को लगभग 60,000 करोड़ रुपए से लगभग एक लाख करोड़ रुपए करके भारत सरकार ने एक सराहनीय कदम उठाया है।

*उत्तराखंड में मनरेगा योजना की स्थिति*-

दो फरवरी 2006 को राज्य के दो जनपदों टिहरी एवं अल्मोड़ा में मनरेगा शुरू की गई। टिहरी जनपद में विकास खण्ड फगोट के आगराखाल में श्रीमती वीभा पुरीदास तत्कालीन प्रमुख सचिव व श्री वीरेन्द्र सिंह कंडारी जी, तत्कालीन क्षेत्र पंचायत प्रमुख फगोट के दिशा निर्देशन इस योजना का शुभारम्भ हुआ। टिहरी जनपद में जिला उद्यान अधिकारी होने के कारण मुझे भी इस कार्यक्रम में शामिल होने का शुअवसर मिला। जिला अधिकारी टिहरी द्वारा मुझे मनरेगा का मास्टर ट्रेनर नामित किया गया।

मनरेगा का मास्टर ट्रेनर होने के कारण मुझे पूरे टिहरी जनपद में मनरेगा के प्रशिक्षण हेतु जान होता था, इस प्रकार मनरेगा के कार्यों को समझने व नजदीकी से देखने का अवसर मिला। शुरू के वर्षों में मनरेगा योजना के प्रति ग्रामीणों का उत्साह देखने को मिलता था, विशेष रूप से महिलाओं में । इस योजना की यह भी विशेषता है कि इसमें रोजगार पाने में पुरुष व महिला में कोई भेद नहीं होता। क्योंकि महिलाएं अन्य जगहों जैसे सड़क निर्माण आदि श्रमिक कार्यों हेतु बाहर नहीं निकल पाती थी। घर पर ही इस योजना में रोजगार मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार भी आया।

संयोगवश वर्ष 2015-16 में मेरी नियुक्ति लोकपाल मनरेगा के पद पर पौड़ी जनपद के लिए हुई। मुझे इस योजना से फिर से जुड़ने का अवसर मिला। अपने लोकपाल मनरेगा जनपपद पौड़ी के कार्यकाल में मैंने अनुभव किया कि लोगों का विशेष रूप से ग्राम प्रधानों का इस योजना के प्रति लगाव कम होने से इच्छुक ग्रामीणों को इस योजना के अंतर्गत रोजगार नहीं मिल पा रहा है। इसके कई कारण मेरे संज्ञान में आये।

योजना के शुरू के वर्षो में अधिकतर ग्राम प्रधानों ने अपने परिवार के सभी सदस्यों व नजदीकियां के ( जो गांवों में नहीं रहते थे ) के जॉब कार्ड अधिक संख्या में बनवाये। योजना का पूरा संचालन क्योंकि ग्राम प्रधान के ही हाथ में होता था, उसे धन का दुरपयोग करने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। आर. टी. आइ. के माध्यम से ग्रामीणों ने ग्राम प्रधानों से जॉब कार्ड धारकों के नाम व पते पूछने शुरू कर दिये इस प्रकार ग्राम प्रधानों के रिस्तेदारों के फर्जी जॉब कार्ड कम होते गए। योजना में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से जैसे-जैसे कर्मचारियों की बढ़ोतरी होती गयी, मजदूरों की हिस्सेदारी उतनी बढ़ती गई।

रोजगार न मिलने की दशा में आवेदक को बेरोजगारी भत्ता देने का प्राविधान है, जिसका भुगतान राज्य सरकार को करना होता है। आवेदक से कार्यक्रम अधिकारी का कार्यालय बिना तिथि डाले आवेदन लेता है। जिससे निर्धारित तिथि के बाद आवेदक को बेरोजगारी भत्ता न देना पड़े। जबकि यह आवेदक का कानूनी हक है कि उसे रोजगार हेतु आवेदन के पन्द्रह दिनों के अन्दर रोजगार देना है।

किन्तु आवेदक को यह कह कर बहका दिया जाता है कि ऊपर से योजना स्वीकृत होने पर रोजगार दे दिया जायेगा। जैसे आवेदन कर्ता पर अहसान कर रहे हों। आश्चर्यजनक रूप से जबसे मनरेगा योजना चली आंकड़ों के अनुसार राज्य में किसी को भी बेरोजगारी भत्ता नहीं दिया गया। याने अभिलेखों में प्रत्येक आवेदक को समय पर योजना में रोजगार उपलब्ध कराया गया।

मुझे अपने लोकपाल के कार्यकाल में पौड़ी जनपद के कोट विकास खण्ड के एक अम्बेडकर गांव में ग्रामीणों से योजना के बारे में वार्तालाप करने का अवसर मिला। इस अवसर पर विकास खण्ड के कर्मचारी ग्राम प्रधान व ग्रामीण जिनमें अधिकतर महिलाएं थी, बड़ी संख्या में उपस्थित थे। मैंने ग्रामीणों से योजना के बारे में जानकारी चाही और पूछा कि इस योजना में सब को समय पर रोजगार मिल रहा है? सबने एक स्वर में कहा कि हमें विगत छै माह से रोजगार नहीं मिला। कुछ गरीब महिलाओं ने तो अपनी व्यथा रोते हुए बताई।

मैंने फिर पूछा कि आप लोगों ने रोजगार के लिए आवेदन किया? सबने हांमी भरी। बाद में काफी पूछ ताछ के बाद पता चला कि रोजगार के लिए आवेदन तो लिए गए किन्तु उन पर आवेदन की दिनांक अंकित नहीं करवाई गई थी। मैंने विकास खण्ड के कर्मचारियों से पूछा, वे भी इधर-उधर के बहाने बनाने लगे। मैंने ग्राम प्रधान से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है उनका जवाब था कि मैं विकास खण्ड कार्यालय के चक्कर काटते-काटते थक गया, वहां की डिमांड का पैसा मैं कहां से दूं। इसलिए गांव की योजना की स्वीकृति ही नहीं मिलती।

कार्यालय पहुंचने पर मैंने कार्यक्रम अधिकारी से स्पष्टीकरण मांग कर एक सप्ताह में कार्य प्रारंभ कराने के निर्देश दिए। तब जा के इस गांव में कार्य प्रारंभ हुआ। कहने का अभिप्राय यह है कि जब कानूनी हक प्राप्त योजना से गरीब ग्रामीणों को समय पर योजना का लाभ नहीं मिल पाता, तो सामान्य योजनाओं का राज्य में क्या हाल होते होंगे।