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क्यों बढ़ रहा है कृषि कानूनों पर सरकार और किसानों के बीच टकराव?
October 2, 2020 • Delhi • लेख

क्यों बढ़ रहा है कृषि कानूनों पर सरकार और किसानों के बीच टकराव?

धर्मेन्द्र मलिक

कृषि अध्यादेश अब कानून बन चुके हैं। सरकार कह रही है नए कानून किसानों की जिंदगी बदल देंगे,लेकिन किसान संगठन उन्हें वापस लेने की मांग पर अड़े हैं। पिछले एक पखवाड़े से कृषि क्षेत्र के लिए बनाये गये तीन कानून 1. कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन एवं कृषि सेवा पर करार अध्यादेश 2020, 2.कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अध्यादेश 2020, 3. आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन अध्यादेश 2020 पर संसद से लेकर सड़क तक हंगामा हो रहा है। कोरोना काल में जब दो गज दी दूरी जरुरी बताई जा रही है, किसान अपने खेत बचाने के लिए सड़क पर उतर रहे हैं। रेल रोकी जा रही हैं। गिरफ्तारियां हो रही हैं। राज्यसभा के 8 सांसदों को निलंबित किया गया। पंजाब से लेकर कर्नाटक तक किसान सड़कों पर है। इसकी तपिश दिल्ली तक भी पहुंच रही है।

एक तरफ सरकार का दावा है कि इन कानूनों से बिचौलिए खत्म होंगे, भंडारण के क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा और किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य मिलेगा। दूसरी तरफ विपक्ष से लेकर किसानों संगठनों के नेता और किसान इसे काला कानून बताते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य को समाप्त किए जाने की कोशिश मान रहे हैं। सरकार अपनी बात पर डटी हुई है। राष्ट्रपति महोदय द्वारा भी इन कानूनों को स्वीकृति प्रदान कर दी गयी है, लेकिन इसके बावजूद भी किसान पीछे हटने को तैयार नहीं है।

कांट्रैक्ट फार्मिंग से किसान या कंपनी किसको फायदा होगा? नए कानून की पूरी शर्तें और गणित समझिए, यह मामला और दिलचस्प हो जाता है कि 20 साल से भाजपा के सहयोगी दल अकाली दल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबधन से अपने नाता तोड़ लेता है। कई राज्यों के मुख्यमंत्री संघीय ढांचे का उल्लंघन बता रहे हैं। कृषि के जानकार कई लोगों का मानना है कि जिस तरह से कोरोना काल में यह अध्यादेश लाये गये उससे स्पष्ट है कि सरकार की नीयत ठीक नहीं है। इस समय अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर चीन व पाकिस्तान के साथ विवाद चल रहा है। देश के अंदर कोराना माहामारी, बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था जैसी गम्भीर समस्याओं से करना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में किसान आन्दोलन आने वाले समय में गम्भीर समस्या बन सकता है।

तमाम बहस किसानों की आजादी और कृषि में पूंजीपतियों के कम्पनी राज पर चल रही है। इसका तीसरा पक्ष आढ़ती व मजदूर अपनी जीविका के खतरे के रूप में देख रहा है। किसानों और उनके प्रतिनिधियों से बिना संवाद किये एवं राज्य को विश्वास में लिये बगैर कोरोना जैसी महामारी के समय कृषि कानूनों को थोपना लोकतांत्रिक व्यवस्था का उल्लंघन है। केन्द्रीय मंत्रिमंडल से हरसिमरत कौर के इस्तीफे के बाद यह विरोध उजागर हुआ है। किसान लगातार महामारी के ड़र के बावजूद भारी संख्या में सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। संवैधानिक व्यवस्था में कृषि राज्य का विषय है ऐसा कहकर कुछ राज्य इसे नकार रहे हैं। देश में 86 प्रतिशत किसानों के पास 2 हेक्टे. से कम जमीन है। ऐसे किसानों को एक देश एक बाजार का लाभ नहीं मिल सकता। ऐसे किसानों को अपनी फसल को आसपास के बाजार में भी बेचना पड़ता है।

वैसे भी कृषि में खुले बाजार की व्यवस्था बिहार राज्य में 2006 से लागू है। दुनिया के सबसे साधन सम्पन्न देश अमेरिका में भी यह व्यवस्था 60 सालों से लागू है। जहां इसका किसानों को नुकसान और कम्पनियों को फायदा हुआ है। अमेरिका के एक किसान 2018 में ट्वीट कर लिखते हैं कि जो मक्का का भाव आज मिल रहा है उससे ज्यादा कीमत उसके पिताजी को 1972 में मिली थी। खुले एवं नियंत्रण मुक्त बाजार किसान हित में नहीं है। अमेरिका कृषि विभाग के एक अर्थशास्त्री का मानना है कि किसानों की आय में लगतार गिरावट आ रही है। इससे स्पष्ट है कि जो बाजार सुधार अमेरिका में 60 वर्ष पहले हुआ उसी सुधार को देश के अर्थशास्त्री भारत में लागू कर रहे हैं।

यह मॉडल अमेरिका और यूरोप में किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो चुका है। अमेरिका और यूरोप में एक देश एक बाजार नहीं एक दुनिया एक बाजार है। वहां के किसान कहीं भी निर्यात कर सकते हैं। फिर भी वहां के किसानों की आमदनी लगातार घट रही है। विषय यह है कि 2006 में बिहार में एपीएमसी एक्ट को समाप्त कर दिया गया और सरकार द्वारा दलील दी गयी कि इससे निजी निवेश बढेगा, निजी मंडिया खुलेंगी किसान को अच्छा दाम मिलेगा। आज बिहार का किसान 1300 रुपये कुन्तल गेंहू बेचने को मजबूर है। दूसरी तरफ पंजाब की मंडी में इसी गेंहू को न्यूनतम समर्थन मूल्य 1925 रुपये में पिछले वर्ष बेचा गया। यही एक कारण है कि पंजाब और हरियाणा का देश की खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण स्थान है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसे 65 साल पुराने कानून में संशोधन से किसानों और उपभोक्ताओं का क्या होगा फायदा? पिछले 20 वर्षों से सरकार की नीतियों और नीयत किसानों और कृषि की समस्याओं पर उदासीन और भ्रमित है। हाल में सरकार की अव्यवहारिक घोषणाओं जैसे-वर्ष 2022 तक किसानों की आय दुगुनी, जीरो बजट खेती एवं फसल बीमा योजना से किसानों का कल्याण, न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर फसलों की खरीदी आदि से सरकार किसानों का विश्वास खो चुकी है। यही कारण है कि किसान अपनी मांगों के लिए बार-बार सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं।

किसान इन तीनों कानूनों को मौजूदा कृषि विपणन और समर्थन मूल्य की व्यवस्था को खत्म करने की साजिश मान रहे हैं। हालांकि भारत सरकार के मंत्रियों और देश के प्रधानमंत्री महोदय द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य और मंउी व्यवस्था को बनाये रखने का भरोसा दिया गया है, लेकिन किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानून बनाये बगैर पीछे हटने को तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री के आश्वासन पर किसान आश्वस्त नहीं है। इससे स्पष्ट है कि किसान और सरकार दोनों न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था को किसानों के लिए हितकारी मानते हैं। किसानों की मांग है कि देश में एक देश एक भाव व्यवस्था लागू करनी चाहिए।

भारत सरकार द्वारा 23 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाता है, लेकिन मुख्यतः दो फसलों गेहूं और चावल की खरीद की जाती है। किसान इस व्यवस्था को फल, सब्जी सहित सभी फसलों में लागू किये जाने की मांग कर रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य धोषित होने के बावजूद भी दलहन, तिलहन, मक्का और कपास के किसानों को खरीद न होने के कारण इसका लाभ नहीं मिल पाता है। अन्तर्राष्ट्रीय संस्था ओसीईडी की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के किसानों की वर्ष 2001 से 2016 के बीच फसल का समर्थन मूल्य न मिलने के कारण 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यानि प्रत्येक वर्ष किसानों को 8 हजार से 10 हजार करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है।

समर्थन मूल्य पर सरकार कुल उत्पादन के सापेक्ष केवल 6 प्रतिशत फसलों की खरीद करती है, बाकी 94 प्रतिशत अनाज किसान खुले बाजार में बेचने को मजबूर हैं। प्रधानमंत्री अगर देश के किसानों को विश्वस्त करना चाहते हैं तो उन्हें घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर सभी कृषि विपणन को गैर कानूनी बनाते हुए खरीद की गारंटी का कानून लाना लाना चाहिए। जिससे देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य स्थिर हो सके। कांट्रैक्ट फार्मिंग में कुल उत्पादन खरीदने व ग्रेडिंग पर रोक लगाये जाने, जीएम बीजों का प्रयोग न करने, किसानों को सिविल कोर्ट जाने की आजादी जैसे प्रावधान किये बिना यह कानून भी किसान विरोधी साबित होगा। भंडारण की सीमा से रोक हटाने से उपभोक्ताओं का भी नुकसान होगा।

अमेरिका में वॉलमार्ट जैसी बड़ी कम्पनियों के भंडारण की कोई सीमा नहीं है, फिर भी किसानों को इसका कोई लाभ नहीं मिला है। खुली मंडी, अनुबन्ध खेती, भंडारण के प्रावधान यह अमेरिका का फ्लॉप हो चुका मॉडल है। हमें देश में उपयोगी मॉडल कोपरेटिव को बढ़ावा दिये जाने की आवश्यकता है। एपीएमसी व पीडीएस बाजार में विकृति पैदा करते हैं ऐसा विश्व व्यापार संगठन का मानना है। जिसको लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य को हमेशा टारगेट किया जाता रहा है। भारत सरकार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य को समाप्त करने का दबाव है। भारत को पैसे की आवश्यकता है। बिना विश्व व्यापार संगठन की शर्तों को मानें यह कर्ज मिलना मुश्किल है। इसलिए आनन-फानन में तीनों कानून लाये गये हैं। भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य को बचाए रखना आसान नहीं है। इसीलिए देश के किसान सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं।

(लेखक भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी हैं)