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माई लार्ड! यह सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति भवन भी किसी के मलबे पर खड़ा है!
November 11, 2019 • Delhi • संपादकीय

 

माई लार्ड! यह सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति भवन भी किसी के मलबे पर खड़ा है!

पुरुषोत्तम शर्मा

9 नवम्बर को अयोध्या की विवादित भूमि पर आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को असहमति के वावजूद भारतीय मुसलमानों ने स्वीकार किया है। भारतीय मुसलमानों की एक बड़ी संस्था अखिल भारतीय मुश्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पहले ही घोषणा की थी कि सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला देगा, भारत के मुसलमान उसे मानेंगे। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी इस फैसले से असहमति के बावजूद उसके खिलाफ अपील करने से मना कर दिया है।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार कर भारतीय मुसलमानों ने देश की संवैधानिक संस्थाओं पर अपना विश्वास जताया है। आज इस फैसले के बाद देश में जो शांति और सुकून का माहौल है, उसका श्रेय निश्चित ही भारतीय मुसलमानों और उनकी संस्थाओं को दिया जाना चाहिए।

जरा सोचिए! यही फैसला अगर मस्जिद के पक्ष में आता तो  क्या यही बात दूसरे पक्ष यानी हिंदूवादी संगठनों पर भी लागू होती? क्या प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का देश के नाम तुरंत ऐसा ही संदेश प्रसारित होता? मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि नहीं! हरगिज नहीं! ऐसे में आज देश एक बार फिर भयानक साम्प्रदायिक दंगों का गवाह बन रहा होता और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लम्बी चुप्पी साधे होते।

आरएसएस और उसके सभी अनुवांशिक संगठनों ने हमेशा इस बात को कहा है कि कोर्ट जो भी फैसला दे, हम मंदिर वहीं बनाएंगे क्योंकि यह हमारी आस्थाओं से जुड़ा मामला है

हम देख रहे हैं कि मुश्लिमों के खिलाफ देश में बढ़ती भीड़ हत्या की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को न संघ के अनुवांशिक संगठन मान रहे हैं और न ही मोदी सरकार।

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उठते सवालों पर बात करते हैं। अयोध्या भूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच का लिखा फैसला और उसके निष्कर्ष खुद ही विरोधाभाषी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में माना है कि  सं.1949 में बाबरी मस्जिद की गुम्बद के नीचे रामलला की मूर्ति रखना गैर कानूनी था। कोर्ट ने माना कि मूर्ति रखने से पहले वहां नमाज पढ़ी जाती थी। कोर्ट ने माना कि 1992 में मस्जिद को गिराना देश के कानून का खुला उलंघन था। कोर्ट ने माना कि ऐसे कोई भी सबूत नहीं मिले जिससे यह साबित होता हो कि मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। अगर इतना सब अपने फैसले में कोर्ट लिख रहा है, तो फिर निष्कर्ष में भूमि का मालिकाना रामलला विराजमान को कैसे दिया गया जो 1949 में वहां स्थापित किए गए। जबकि वहां मस्जिद का अस्तित्व उससे सवा चार सौ साल पहले से था।

दूसरी बात सुप्रीम कोर्ट ने जिस भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण यानी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर यह फैसला दिया, उसमें स्प्ष्ट रूप से कहा गया है कि मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। हां खुदाई के दौरान मिले अवशेष 12 वीं सदी के बताए गए जिनमें कुछ मूर्तियों की आकृति भी थी। अब अगर जमीन के नीचे से मिले पुरातात्विक अवशेषों को भूमि के मालिकाने का आधार बनाया जाएगा तो माई लार्ड! भारत का सुप्रीम कोर्ट, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, चाणक्यपुरी के नीचे भी मालचा, रायसीना हिल्स, कुशक, खैरपुर, अडकपुर, मादलपुर, बीबीपुर, मुजादपुर, जापटागंज, बाबरपुर, बाराखंभा, तालकटोरा, श्रवण सराय, बस्ती घोसियान (दरियागंज), गोड्ढ़ा, कोटला, तिलंगपुर, प्रह्लादपुर, मंगलापुरी, इंद्रपोल, काजीपुर नाम के 21 गांवों के तमाम अवशेष दबे पड़े हैं, जिन्हें तोपों के जोर से बलपूर्वक उजाड़कर अंग्रेजों ने 1912 में दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया था। तब क्या इन सब जगहों का मालिकाना वापस उन उजड़े 21 गांवों को वापस मिलेगा, जिनमें से कई को आज तक भी कोई मुआवजा भुगतान नहीं हुआ है?

उत्तराखण्ड के गढ़वाल क्षेत्र में खासकर चमोली , टिहरी और रुद्रप्रयाग जिलों में घर के हर दरवाजे के माथे पर लगी लकड़ी में गणेश की मूर्ति गोदी हुई रहती है। इसे वहां खोली का गणेश कहते हैं और घर में हर शुभ कार्य पर पहले इस खोली के गणेश की पूजा होती है। ऐसे में प्राकृतिक आपदाओं में दबे गावों का मलवा अगर सैकड़ों वर्षों बाद खुदाई में मिले तो क्या हम उसे मंदिर के अवशेष मान लेंगें?

तमाम सत्ताएं अपने दौर में पुराने को ध्वस्त कर कुछ नया निर्मित करती रही हैं। पुराने समय में किले, मकबरे, मंदिर, मस्जिद और तालाब बनाने के लिए आबादियों या निर्मित ढांचों को उजाड़ा जाता था। आज नए नगरों, रोड, रेल , उद्योग, विद्युत उत्पादन , खनिज के लिए बड़ी आबादियों और निर्मित ढांचों को उजाड़ा जा रहा है

जो सुप्रीम कोर्ट जमीन के नीचे दबे अवशेषों के आधार पर मालिकाना दे रहा है, वह सत्ता के कहने पर फिर से आबादियों को उजाड़ने का आदेश क्यों पारित करता है? सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस ए के गांगुली ने भी कहा कि यह फैसला सबको न्याय देने में असफल रहा। उन्होंने कहा जब देश का संविधान बन रहा था तब वहां मस्जिद थी और नमाज पढ़ी जाती थी। फिर वहां मंदिर बनाने का आदेश देना समझ से परे है। 

इस असंगत फैसले ने देश में साम्प्रदायिक फासीवादी ताकतों के लिए एक ऐसा पिटारा खोल दिया है जो भविष्य में मुश्लिम विरोधी उनके अभियान को और ताकत देगा। काशी, मथुरा, ताजमहल सहित देश की मुग़लकाल में निर्मित तमाम धरोहरों को मिटाने के उनके आपराधिक मशूबों को एक नजीर देगा

आज के दौर में जब कुछ न्यायाधीश सेवानिवृति के बाद भी सत्ता का प्रसाद पाने को आतुर दिखते हैं, तो कोर्ट के फैसलों में सत्ता की इच्छा का प्रतिबिंब होना कोई आश्चर्य की बात नहीं।