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तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों में देशव्यापी उबाल
September 29, 2020 • Delhi • रिपोर्ट

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों में देशव्यापी उबाल

पुरुषोत्तम शर्मा

देश की खेती, किसानी और खाद्य सुरक्षा को कारपोरेट व बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गुलाम बनाने वाले तीन कानूनों को जबरन संसद में पारित किए जाने के विरोध में देश के किसानों और खेत मजदूरों ने 25 सितम्बर 2020 को अपने राष्ट्रव्यापी संघर्ष का बिगुल बजा दिया है. अनुमान है कि 25 सिम्बर को देश भर में एक लाख से ज्यादा स्थानों पर विरोध कार्यक्रम आयोजित हुए और दो करोड़ से ज्यादा लोगों ने इनमें सक्रिय भाग लिया. राष्ट्रपति द्वारा 27 सितम्बर को तीनों कृषि बिलों पर हस्ताक्षर कर दिए जाने के बाद भी किसानों का यह आन्दोलन देश भर में लगातार जारी है. देश के किसान संगठनों के आह्वान पर 25 सितम्बर को पंजाब और हरियाणा में सम्पूर्ण बंद रहा. पश्चिम उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्यप्रदेश के कई इलाकों में बंदी रही तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू, असम व अन्य क्षेत्रों में बड़ी-बड़ी विरोध सभाएं हुईं. किसानों के इस राष्ट्रव्यापी बंद व प्रतिरोध दिवस को देश की दस केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों, छात्र, युवा व महिला संगठनों, वामपंथी पार्टियों ने पहले ही खुला समर्थन जाहिर कर दिया था. वे सब देश भर में किसानों के समर्थन में सड़कों पर उतरे दिखे. विपक्ष की अन्य पार्टियों और अकाली दल ने भी किसानों का साथ दिया. पंजाब, कर्नाटक सहित देश के कई हिस्सों में लेखकों, कवियों, लोक गायकों, फिल्म, थियेटर व कला से जुड़े लोग भी किसानों के साथ आन्दोलन में उतरे. सम्पूर्ण पंजाब सहित देश के कई भागों में व्यापारी व आढती संगठनों ने बंद रख किसानों के आन्दोलन को अपना समर्थन दिया. 25 सितम्बर भारत में किसानों के बंद व प्रतिरोध आंदोलन के समर्थन में कनाडा में रह रहे भारतीय प्रवासियों का बड़ा जुलूस निकाला और उन्होंने किसान विरोधी तीनों कृषि बिल वापस लेने की मांग की.

अखिल भारतीय किसान महासभा ने देश के संघर्षरत किसानों, किसान संगठनों को तीन कृषि संबंधी बिलों के खिलाफ 25 सितम्बर के भारत बंद व प्रतिरोध दिवस की अभूतपूर्व सफलता पर क्रांतिकारी अभिवादन किया. साथ ही इस आंदोलन को समर्थन देने वाले ट्रेड यूनियनों, छात्र, युवा, महिला, व्यापारी संगठनों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों, गायकों, फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों और वाम पार्टियों सहित विपक्ष की पार्टियों का भी आभार व्यक्त किया है. राष्ट्रीय मीडिया के बड़े हिस्से ने इतने व्यापक आंदोलन की अनदेखी की. फिर भी राष्ट्रीय मीडिया के उस छोटे हिस्से और सोशल मीडिया के उन तमाम साहसी मित्रों को भी किसान महासभा ने धन्यवाद दिया, जो तमाम जोखिमों के बाद भी लोकतंत्र के चौथे खम्बे की ज्योति जलाए हैं. किसान महासभा ने अपने वक्तव्य में कहा कि देश के किसानों द्वारा कृषि प्रधान भारत की खेती, किसानी और खाद्य सुरक्षा को कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय निगमों का गुलाम बनाने, जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को कारपोरेट के मुनाफे के लिए उपभोक्ता माल में तब्दील करने के लिए लाए गए इन बिलों का इतना व्यापक विरोध स्वाभाविक है. देश की आबादी का 60 प्रतिशत किसान व ग्रामीण गरीब अपनी खेती का उत्पादन, भंडारण और बाजार को कारपोरेट व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथ किसी भी कीमत पर नहीं जाने देंगे.

यही वह बात है जिसने आज देश के सभी संघर्षरत किसान संगठन को इन तीनों बिलों के खिलाफ संयुक्त आंदोलन में उतारा है. इस लिए मोदी सरकार द्वारा कोरोना संकट की आड़ में संसदीय नियमों की खुली अवहेलना कर जबरन पास कराए गए इन तीन बिलों का कड़ा विरोध आगे भी जारी रहेगा. 25 सितम्बर के राष्ट्रव्यापी बंद व प्रतिरोध दिवस पर 25 से लेकर 7 हजार तक की गोलबंदी के इन एक लाख कार्यक्रमों में दो करोड़ से ज्यादा लोगों की भागीदारी कोविड दौर में पूरी दुनिया और आजादी के बाद भारत के जन आंदोलनों के इतिहास में सबसे बड़ी जन गोलबंदी है. किसान विरोधी भाजपा और संसद में इन बिलों को समर्थन देने वाले उसके सहयोगियों का देश के किसानों ने गांव-गांव में सामाजिक बहिष्कार कार्यक्रम पंजाब व हरियाणा से शुरू कर दिया है. पंजाब व हरियाणा के गांवों और शहरों में भाजपा के बहिष्कार के बैनर टांगे जा रहे हैं. वहां ग्राम पंचायतों की खुली बैठकों में भाजपा व उसके सहयोगियों के बहिष्कार के प्रस्ताव पास कर गांव के बाहर इसके बैनर टांगे जा रहे हैं. कई व्यापार मंडलों या आढ़ती संगठनों ने भी ऐसे बैनर टांगे हैं. पंजाब में किसानों का 24 सितम्बर से शुरू तीन दिन तक रेल रोको आंदोलन के बाद अब किसान दो अक्टूबर तक लगातार रेल रोकने की घोषणा कर चुके हैं. अगर केंद्र सरकार इन बिलों को वापस नहीं लेती है, तो देश के किसान संगठनों द्वारा बिल पास कराने वाले दलों के नेताओं का बहिष्कार अभियान देश भर में फैलाया जाएगा. 

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) की अपील पर 28 सितम्बर 2020 को महान राष्ट्रवादी, क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह के 114वें जन्मदिवस के अवसर पर देश भर में कृषि सम्बन्धी इन तीनों काले कानूनों से खाद्य सुरक्षा को खतरे पर विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए. एआइकेएससीसी ने सरकार के अन्य बहुराष्ट्रीय कम्पनी परस्त, करापोरेट परस्त कदमों जैसे डीजल-पेट्रोल के दाम व करों में वृद्धि और नया बिजली कानून 2020, जो शुरुआती दर रु0 10.20 कर देगा, का विरोध करने का भी आह्वान किया था. शहीद भगत सिंह ने यह बात कही थी कि ‘गोरे साहब चले गये और भारत में काले साहब का राज आ गया तो कुछ नहीं बदलेगा’. आरएसएस-भाजपा का भारतीय खेती में विदेशी कम्पनियों और कारपोरेट की लूट के प्रति समर्पण इस बात को साबित करता है कि उनकी भूमिका भगत सिंह के काले साहबों की तरह है. एआईकेएससीसी ने कहा है कि आरएसएस-भाजपा नेतृत्व वाली मोदी सरकार द्वारा पेश कानून विदेशी कम्पनियों और बड़े प्रतिष्ठानों को सरकारी मंडी के बाहर अपनी निजी मंडिया बनाने की अनुमति देते हैं. ये फसल की खरीद पर एकाधिकार करके उन्हें बहुत सस्ते दामों पर खरीदेंगे. इनकी मंडियों को श्री नरेन्द्र मोदी सरकार ने टैक्स से भी मुक्त कर दिया है. इससे सारी सरकारी खरीद, भंडारण व राशन में अनाज की आपूर्ति समाप्त हो जाएगी. मोदी सरकार ने मंडी बिल को दाम आश्वासन और ठेका खेती बिल को आमदनी आश्वासन कह कर किसानों को धोखा देने की कोशिश की है.

वे इन्हें आत्मनिर्भर विकास व किसानों का सुरक्षा कवच बताने का नाटक कर रहे हैं. सच यह है कि ये कानून वास्तव में ‘सरकारी मंडी बाईपास’ तथा किसानों को ‘कारपोरेट जाल मे फंसाने’ के कानून हैं. किसानों की कोई बेड़ी नहीं खुलेगी, क्योंकि ग्रामीण मंडियां निजी करापोरेशन के कब्जे में होंगी, किसान अनुबंध खेती द्वारा उनसे बंधे होंगे और उनकी जमीनें निजी सूदखोरों के हाथों गिरवी रखी होंगी. ये कानून उदारीकरण नीति का गतिमान रूप हैं और इनके अमल से किसानों पर कर्जे बढ़ेंगे और आत्महत्याएं तेज होंगी. एआईकेएससीसी ने खा कि इन कानूनों के द्वारा सरकार ने देश की खाद्यान्न सुरक्षा पर गम्भीर हमला किया है. उसने सभी अनाज, दालें, तिलहन, आलू व प्याज को आवश्यक वस्तुओं की सूची से मुक्त कर दिया है. इसका नया कानून असल में ‘कालाबाजारी की मुक्ति’ कानून है, जिसमें फसल खरीद पर नियंत्रण करने वाले प्रतिष्ठानों को जमाखोरी व कालाबाजारी की पूरी छूट होगी और 75 करोड़ राशन के लाभार्थियों को मजबूरन खुले बाजार से अनाज खरीदना होगा. केन्द्रीय कृषि मंत्री सरकारी खरीद और एमएसपी को जारी रखने की बात कह के लोगों को मूर्ख बना रहे हैं. आज भी ये दोनों चीजें बहुत कम ही अमल की जाती हैं और सरकार को इनके अमल करने के लिए बाध्य करने का कोई कानून मौजूद ही नहीं है. फिर भी सरकार ने विदेशी कम्पनियों का कृषि बाजार पर नियंत्रण करने देने का कानून बनाया है और भगत सिंह को चेतावनी को सही साबित किया है.

भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) ने कहा है कि इन बिलों का किसानों की समृद्धि से कोई लेना-देना नहीं है. देश के कई अन्य किसान संगठनों के साथ-साथ भारतीय किसान यूनियन भी किसान विरोधी बिलों के बारे में गंभीर रूप से चिंतित है, जो किसी भी संसदीय चर्चा के बिना किसी भी किसान संगठनों के साथ परामर्श के बिना अलोकतांत्रिक तरीके से, अध्यादेश के आपातकालीन उपाय के माध्यम से अचानक लाये गए हैं. किसान यूनियन ने कहा कि हम इन बिलों को लाने की प्रक्रिया और सार दोनों का विरोध करते हैं. भाजपा सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का चुनावी वादा किया था. उस वादे को पूरा करने के बजाय, किसानों को उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए सरकारों की जिम्मेदारी को समाप्त करने के लिए पारित किए गए इन बिलों के द्वारा हमें थप्पड़ मारा जा रहा है. पूरी तरीके से देखा जाये तो इन बिलों का किसानों की आय में सुधार से कोई लेना-देना नहीं है, देश में 80 प्रतिशत से अधिक छोटे और सीमांत किसान हैं. कारपोरेट कृषि व्यवसाय को सशक्त करेंगे और हमारे खाद्य प्रणालियों पर कॉरपोरेट नियंत्रण को बढ़ाएंगे.

किसान यूनियन ने कहा कि इन कानूनों के लागू होने के बाद किसानों और उपभोक्ताओं के लिऐ न्याय की गुंजाइश नहीं रहेगी. यह किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को समाप्त करने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पूरी तरह से नष्ट करने, बेईमान व्यापारियों को बढ़ावा देने और खाद्य पदार्थों को जमा करने के लिए विशाल निगमों (कार्पोरेशनों) को बढ़ावा देगा. जिससे बाजार में कृत्रिम रूप से भोजन की कमी पैदा होगी और अनियमित कीमतें बढ़ेंगी. इन कानूनों से भारत की खाद्य संप्रभुता और सुरक्षा को गंभीर खतरा है. किसानों को अपनी उपज की कीमत तय करने की आजादी की जरूरत है न कि अपनी उपज को बड़े कॉर्पोरेट्स को बेचने की आजादी. सभी किसानों से अपील है कि खेती को बचाने और राष्ट्र की खाद्य संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एकजुट हों. अगली रणनीति का ऐलान जल्द ही सभी संगठनों से चर्चा कर किया जायेगा.

किसान यूनियन के नेतृत्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर में 80, मुजफ्फरनगर में 11, शामली में 3, सहारनपुर में 5, गाजियाबाद में 2, नोएडा में 2, हापुड में 4, मेरठ में 9, मुरादाबाद में 10, शाहजहांपुर में 3, रामपुर में 2, मैनपुर, आगरा, मथुरा, अलीगढ़ सहित पूरे प्रदेश में चक्का जाम किया गया. बंद में भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौ0 नरेश टिकैत पानीपत-खटीमा मार्ग लालूखेडी मुजफ्फरनगर में, राष्ट्रीय प्रवक्ता चौ0 राकेश टिकैत राष्ट्रीय राजमार्ग 58 रामपुर तिराहा, नावला कोठी, रोहाना चौकी मुजफ्फरनगर में शामिल हुए. भारतीय किसान यूनियन हरियाणा के प्रदेश अध्यक्ष रतनसिंह मान कैथल व करनाल में शामिल रहे. पंजाब के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष हरेन्द्र सिंह लाखोवाल लुधियाना में मौजूद रहे. भारतीय किसान यूनियन किसानों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल सहित उत्तर भारत में किसानों का प्रतिनिधित्व करता है.

अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कामरेड अशोक धावले के नेतृत्व में मुम्बई-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग को दो हजार किसानों ने जाम कर दिया. पूरे राज्य में कई जिलों में किसान सभा के नेतृत्व में सड़क जाम व प्रतिरोध मार्च आयोजित किए गए. पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय किसान सभा ने लगभग हर जिले के कई  स्थानों में चक्का जाम किया. संगठन की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 92 स्थानों में राष्ट्रीय राजमार्गों, 89 स्थानों में राज्य मार्गों को जाम किया गया. केरल में किसान सभा के नेतृत्व में केंद्र सरकार के 250 कार्यालयों पर धरना-प्रदर्शन किया गया. संगठन के कार्यकर्ताओं ने उड़ीसा, असम, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, हिमांचल, जम्मू कश्मीर, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली में भी जाम व प्रतिरोध मार्च आयोजित किए. एडवा, सीटू, एसएफआई ने भी किसानों के इस देशव्यापी आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी की.

पंजाब में किसान आन्दोलन का सर्वाधिक असर रहा. यहाँ किसानों के लिए संघर्षरत सभी 31 किसान संगठन पहली बार एक साथ आकर इस संघर्ष को व्यापक बना दिए हैं. कृषि बिलों के खिलाफ पूरा पंजाब बंद व जाम रहा. गाँवों से लेकार शहरों तक सड़कों व रेल पटरियों पर सुबह से ही किसान जुटने लगे थे. महिलाओं की भी अच्छी भागीदारी थी. लेखकों, लोक गायकों, कलाकारों, पंजाबी फिल्म इंडट्रीज ने खुल कर किसानों का साथ दिया. पंजाब के व्यापारी संगठनों व आढ़तियों ने भी आन्दोलन में सक्रिय हिस्सा लिया. आन्दोलनकारियों के लिए जगह–जगह लंगर लगे दिखे. आन्दोलन के कारण कम से कम 28 यात्री ट्रेनों को रद्द कर दिया गया. क्योंकि पंजाब में 24 फरवरी से ही “रेल रोको” आन्दोलन के कारण किसानों ने ट्रेन की पटरियों पर धारना देकर उनको अवरुद्ध कर दिया था. विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब में अब दो अक्टूबर तक रेल रोको आन्दोलन होगा. “किसान मजदूर संघर्ष समिति के राज्य सचिव सरवन सिंह पंढेर ने कहा “पीएम मोदी इन बिलों को जमीन पर नहीं उतार पाएंगे. वह विपक्ष पर आरोप लगा रहे हैं कि वह हमें परेशान कर रहे हैं. यह सही नहीं है. हमने अध्यादेशों (अब बिलों) को पढ़ा है. कॉरपोरेट्स ने पीएम को धक्का दिया है इन परिवर्तनों को शुरू करने के लिए. हमें देश भर के किसानों का समर्थन मिल रहा है; हमारी संख्या बहुत बड़ी है. यह एक बहुत बड़ा जन आंदोलन है.

मानसा में किसानों, आढ़तियों, व्यापारियों की विशाल संयुक्त रैली निकली. रैली में भाकपा माले ने भी पूरी ताकत के साथ हिस्सा लिया. पंजाब किसान यूनियन कई दिनों से इसकी तैयारी में जुटी थी. रैली को अन्य नेताओं के अलावा मुख्य रूप से किसान महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कामरेड रुलदू सिंह ने संबोधित किया. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार को हमारी खेती, किसानों और देश की खाद्य सुरक्षा की गुलामी के इन काले कानूनों को वापस लेना होगा. कामरेड रुलदू सिंह ने कहा कि प्रधान मंत्री मोदी और उनकी सरकार के किसी भी आश्वासन पर देश के किसान को भरोषा नहीं है. इस सरकार ने आज तक देश की जनता को सिर्फ धोखा दिया है और देश के बड़े पूंजीपतियों के लिए देश को नीलाम कर रहे हैं. उन्होंने कहा देश का किसान खेती और खाद्य सुरक्षा की गुलामी को बर्दास्त नहीं करेगा. कोरोना संकट की आड़ में यह सरकार खेती किसानी पर हमले कर रही है. भिखी में किसानों व्यापारियों की संयुक्त रैली को पंजाब किसान यूनियन के राज्य सचिव कामरेड गुरुनाम सिंह ने संबोधित किया. उन्होंने कहा कि सरकार इन काले कानूनों को वापस ले या देशव्यापी जन आंदोलनों का सामना करे. उन्होंने कहा कि किसानों का यह आन्दोलन पाताब तक जारी रहेगा जब तक या तो इन तीनों काले बिलों को सरकार वापस ले या गद्दी छोड़े. पटियाला में एआइकेएससीसी के पंजाब कन्वीनर डॉ दर्शन पाल ने किसानों को संबोधित किया.

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के आह्वान पर राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध, चक्का जाम कार्यक्रम के तहत अखिल भारतीय किसान महासभा तथा भाकपा माले के संयुक्त बैनर से बिहार में कार्यक्रम लिए गए. पटना महानगर में संयुक्त रुप से सीपीआई, सीपीएम तथा भाकपा-माले के किसान संगठन पटना स्टेशन से मार्च निकालकर डाक बंगला चौराहा तक गए और वहां सभा की. पटना महानगर में ही अखिल भारतीय किसान महासभा, भाकपा-माले, एक्टू, एपवा, आइसा, आरवाइए तथा अन्य संगठन ने संयुक्त रुप से पटना बुध पार्क से मार्च निकाला और डाक बंगला चौराहा तक गए तथा वहां एक सभा में शामिल हो गए. सभा को भाकपा-माले के महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य तथा अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय महासचिव राजा राम सिंह ने संबोधित किया. कार्यक्रम में मुख्य रूप से उक्त नेताओं के अलावा भाकपा-माले के राज्य सचिव कुणाल, पोलित ब्यूरो के सदस्य धीरेन्द्र झा, एपवा महासचिव मीना तिवारी, किसान नेता उमेश सिंह, राजेन्द्र पटेल, शंभूनाथ मेहता, अभ्युदय आदि शामिल थे. भाकपा-माले महासचिव ने अपने संबोधन में कहा कि आज किसान विरोधी काले बिलों की वापसी की मांग पर पूरे देश में प्रतिवाद हो रहा है. कहीं बंद है, तो कहीं सड़क जाम है. ये बिल किसानों के लिए बेहद खतरनाक हैं. राज्य सभा में जिस प्रकार से बहुमत नहीं रहने के बावजूद जबरदस्ती बिल पारित करवाया गया, वह लोकतंत्र की हत्या है. इसे देश कभी मंजूर नहीं करेगा.

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार द्वारा खेती की नीलामी व कारपोरटों की दलाली हमें मंजूर नहीं है. आज देश के किसानों के समर्थन में मजदूर, छात्र-नौजवान व आम नागरिक सड़क पर उतर आए हैं. किसान विरोधी सरकार इस देश में राज नहीं कर सकती है. हमें कंपनी राज मंजूर नहीं है. पहले देश में अंग्रेजों का कंपनी राज चलता था, अब ये सोचते हैं कि अंबानी-अडानी का कंपनी राज चलेगा, ऐसा नहीं हो सकता है. जब तक ये बिल वापस नहीं होते, लड़ाई जारी रहेगी. बिहार विधानसभा चुनाव में भी यह मुद्दा बनेगा और चुनाव में किसानों के आक्रोश की अभिव्यक्ति होगी. अखिल भारतीय किसान महासभा के महासचिव राजा राम सिंह ने कहा कि आज देश के सभी किसान संगठन सड़क पर हैं. मजदूर संगठनों के साथी हमारे साथ हैं. हम मोदी सरकार द्वारा लाए गए किसान विरोधी कानूनों को देश में नहीं चलने देंगे. आज एक-एक कर मोदी सरकार कंपनियों के हाथों देश को बेच रही है. यह हमें मंजूर नहीं है. इस सरकार ने एमएसपी पर कानून नहीं बनाया लेकिन किसानों की खेती छीन लेने पर आमदा है. यह चलने वाला नहीं है.

बिहार के वैशाली जिले में किसान महासभा के राज्य अध्यक्ष कामरेड विशेश्वर प्रसाद यादव के नेतृत्व में किसानों ने सड़क जाम की। वैशाली जिले में नौ स्थानों पर किसान महासभा के कार्यकर्ताओं ने दो घण्टे का सड़क जाम किया। इससे जिले के सभी प्रमुख मार्ग जाम हो गए। जहानाबाद में रेलवे स्टेशन से अरवल मोड़ तक विरोध मार्च निकालकर अरवल मोड़ पर एक सभा की गई. सभा को अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय और राज्य सचिव रामाधार सिंह तथा भाकपा-माले के जिला सचिव श्रीनिवास शर्मा संबोधित किया. मार्च में शामिल थे अखिल भारतीय किसान महासभा के जिला सचिव शौकीन यादव, जिला कमेटी सदस्य ब्रह्मदेव प्रसाद, राजनंदन यादव व अन्य. इसी जिले के मखदुमपुर तथा काको में भी विरोध सभा की गई. नालंदा जिले में 12 स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए. हिलसा, थरथरी, चंडी, इस्लामपुर, बिहार शरीफ में चक्का जाम किया गया. हिलसा, थरथरी, तथा चंडी में प्रदर्शन, इस्लामपुर, बिहार शरीफ, रहुई तथा अन्य जगह प्रधानमंत्री का पुतला दहन किया गया. पटना जिले में 12 प्रखंडों में कार्यक्रम आयोजित किए गए. नौबतपुर, बैरिया, फतुहा, मसौढ़ी, पालीगंज,  दुल्हन बाजार, बिहटा, नौबतपुर, विक्रम, फुलवारी, मनेर प्रखंड पर प्रदर्शन किए गए तथा बैरिया, बीबीपुर, संपतचक में प्रधानमंत्री का पुतला जलाया गया.

बेगूसराय में मार्च निकालकर पुतला जलाया गया जिसका नेतृत्व किसान महासभा के जिला सचिव बैजू सिंह ने किया. कैमूर जिले में विरोध मार्च के बाद पुतला जलाया गया. पूर्णिया जिले के रुपौली में विरोध मार्च के बाद पुतला जलाया गया जिसका नेतृत्व कामरेड अविनाश पासवान ने किया. नवादा जिले में डीएम कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन कर मांग पत्र दिया गया. औरंगाबाद जिले के दाउद नगर में रोड जाम किया गया, जिसमें जनार्दन सिंह, कामता यादव व नरेंद्र सिंह सहित अन्य ने नेतृत्व किया. राजपुर में विरोध जुलूस का नेतृत्व वीरेंद्र सिंह ने किया. भोजपुर जिले के जगदीशपुर, कोईलवर, गढ़ानी, चरपोखरी, पीरो, अगिआंव, सहार, संदेश, व तरारी प्रखंड में मार्च व सभा की गई. चरपोखरी में अध्यादेश का अर्थी जुलूस निकाला गया. सिवान जिले में जिला मुख्यालय पर मार्च निकालकर सभा की गई. अरवल जिले में भाकपा-माले कार्यालय से मार्च निकालकर डीएम कार्यालय तक गया तथा ब्लॉक परिसर में एक बड़ी सभा की गई. गया जिले में शहर में मार्च निकालकर सभा की गई. राज्य के विभिन्न भागों में एआइकेएससीसी से जुड़े अन्य संगठनों ने भी विरोध कार्यक्रम आयोजित किए.

राजस्थान में अखिल भारतीय किसान महासभा ने चिङावा- सिंघाना दिल्ली हाइवे पर भैसावता खुर्द के आगे जोहङ में चक्का जाम किया. इस अवसर पर सी• आई• राजस्थान पुलिस बुहाना को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन दिया. ज्ञापन में राष्ट्रपति से संसद में अनैतिक तरीके से पास किये गये तीनों कृषि विधेयकों पर किसानों के हित में हस्ताक्षर नहीं करने, इन्हें वापस लेने के लिए केंद्र सरकार को निर्देशित करने, कारपोरेट परस्त जन विरोधी बिजली सुधार विधेयक को वापस लेने के लिए केंद्र सरकार को निर्देशित करने, पैंट्रोल व डीजल तथा गैस को जी एस टी के दायरे में लाने, और उस पर लगे सभी सैस हटाने आदि 10 मांगें थी.

आज चक्काजाम अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड रामचन्द्र कुलहरि, जिला अध्यक्ष कामरेड ओमप्रकाश झारोङा, जिला उपाध्यक्ष कामरेड इंद्राज सिंह चारावास, जिला उपाध्यक्ष कामरेड सूरजभान सिंह, खेतङी प्रखंड सचिव कामरेड अमर सिंह चाहर, अखिल भारतीय किसान सभा के चिङावा प्रखंड अध्यक्ष कामरेड बजरंग लाल बराला, इंकलाबी नौजवान सभा के जिला संयोजक कामरेड रविन्द्र पायल, सुरेश धेधङ, कामरेड होशियार सिंह, महीपाल चारावास, प्रेम सिंह नेहरा, सुभाष चाहर,  नरेश जसरापुर, ओमवीर जांगिङ, काशीराम, शीशराम, इंकलाबी नौजवान सभा के कृष्ण कुमार सोमरा, वासुदेव शर्मा, सूरत सिंह कुलहरि, जगवीर आर्यनगर आदि शामिल थे. किसान महासभा और भाकपा-माले द्वारा राज्य के उदयपुर और प्रतापगढ़ जिलों में भी विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए. एआइकेएससीसी से जुड़े अखिल भारतीय किसान सभा और अन्य संगठनों ने भी राज्य के विभिन्न जिलों में विरोध कार्यक्रम आयोजित किए.

हरियाणा पंजाब के बाद सर्वाधिक सफल बंद वाला राज्य रहा. जहां सुबह से ही किसानों के जत्थे सड़कों पर उतरने शुरू हो गए थे. किसान आन्दोलन का इतना व्यापक प्रभाव था कि पूरा हरियाणा किसानों के जाम व बंद के आगोश में आ गया था. किसान संगठनों के अलावा आढ़ती और व्यापारी संगठनों ने भी किसानों के हरियाणा बंद को पूरा समर्थन दिया. हरियाणा में वामपंथी पार्टियों, कांग्रेस और आप का भी किसान आन्दोलन को समर्थन था. भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) सहित किसान यूनियन के सभी धड़े और वामपंथी किसान संगठन बंद को सफल बनाने में पूरी ताकत से जुटे थे. अखिल भारतीय किसान महासभा ने अखिल भारतीय किसान सँघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले अम्बाला, यमुनानगर, करनाल, कैथल, जींद, फतेहाबाद, सिरसा, भिवानी, रेवाड़ी, गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूह(मेवात), सोनीपत, पलवल आदि जिलों में विरोध कार्यक्रम किये. राज्य के रतिया में किसान महासभा के नेता सुखविंदर सिंह रतिया के नेतृत्व किसान महासभा ने संयुंक्त विरोध रैली में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. यहाँ हुई किसानों की विरोध रैली को स्वराज अभियान के संयोजक योगेन्द्र यादव ने भी संम्बोधित किया. इसके अलावा राज्य के सभी हिस्सों में यहाँ कार्यरत भारतीय किसान यूनियन के तमाम हिस्सों ने लाखों किसानों को सड़कों पर उतारा.

तमिलनाडु में अखिल भारतीय किसान महासभा, एक्टू और भाकपा-माले के साथियों ने 14 जिलों में रोड जाम, पुतला दहन सहित प्रतिरोध कार्यक्रम आयोजित किए. सलेम में कामरेड नारायनन, पुद्दुकोट्टई में कामरेड राजांगम, शिवाकंगई में कामरेड नारायनन, डिंडीगुल में कामरेड जगदीश, कल्लाकुरिचि में कामरेड राधाकृष्णन, थिरुवन्नामलाई में कामरेड राहामथुल्ला, थेंकसी में कामरेड शेख मोहिदीन, मायीलादुथुराई में कामरेड लोर्दुस्वामी, थंजावुर में कामरेड कन्नाईयन, कुड्डालोर में कामरेड राजाशंकर, मदुरई में कामरेड निवेधा, धर्मापुरी में कामरेड गोविन्दराज, करूर में एकतु नेता कामरेड रामचंद्रन, त्रिची में एक्यू राज्य सचिव देसिगन के अलावा भाकपा-माले केन्द्रीय कमेटी सदस्य कामरेड असाईथम्बी और कामरेड चन्द्र मोहन ने विरोध कार्यक्रमों का नेतृत्व किया. तमिलनाडु में इन सभी जिला मुख्यालयों और पुडूकोट्टई जिले के सात स्थानों में ये विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए. कर्नाटक में एआइकेएससीसी से जुड़े संगठनों, दलित संगठनों, मजदूर कर्मचारी संगठनों ने साझा कार्यक्रम किए. अखिल भारतीय खेत एवं ग्रामीण मजदूर सभा के बैनर से बेल्लारी व कोप्पल जिलों में रास्ता रोको सहित सभी विरोध कार्यक्रमों में सक्रिय व प्रभावकारी भागीदारी की गयी. एक्टू बंगलुरु में रास्ता रोको आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाया. 28 सितम्बर के कर्नाटक बंद के सफल संयुक्त आह्वान में भी एक्टू और अखिल भारतीय खेत एवं ग्रामीण मजदूर सभा ने पूरे कर्नाटक में सक्रिय भूमिका निभाई.

आंध्र प्रदेश में अखिल भारतीय किसान महासभा ने सात जिलों में प्रतिरोध कार्यक्रम आयोजित किए. राज्य के कृष्णा, कडपा, कुरनूल. गुंटूर, ईस्ट गोदावरी, विशाखापट्टनम, श्रीकाकुलम में पुतला दहन, प्रतिरोध मार्च व धरना, विरोध सभा कार्यक्रम आयोजित किए गए. इन कार्यक्रमों को किसान महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कामरेड डी हरिनाथ, कामरेड टी अन्जनेयुला, कामरेड टी सन्यासी राव, कामरेड एम रामाराव, कामरेड कामेश्वर राव, कामरेड दुश्यन्थ, कामरेड पी एस अजय कुमार, कामरेड के गणेश, कामरेड एम लक्चा बाबू, कामरेड चन्द्र राव, कामरेड दी पुल्ला राव, कामरेड बक्कईयह, कामरेड मरेश्वर राव, कामरेड जोशी, कामरेड वेंकटेश्वरलू, कामरेड रामदेव, कामरेड नीलप्पा, कामरेड बाबू राव, कामरेड राजेन्द्र प्रसाद, कामरेड तिरुपति राव आदि नेताओं ने कार्यक्रमों का नेतृत्व किया. उड़ीसा में रायगडा जिले के गुनुपुर में कामरेड तिरुपति गोमांगो और संबरा सबारा के नेतृत्व में 500 किसानों और खेत मजदूरों का प्रभावशाली प्रतिरोध मार्च निकला. पुरी में किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड अशोक प्रधान, केंद्रपाड़ा में कामरेड प्रकाश मलिक, सोनपुर में कामरेड कुसामोहकुड, बोलंगीर में कामरेड बनबिहारी बेहरा ने कार्यक्रमों का नेतृत्व किया.  पुरी का कार्यक्रम अन्य संगठनों के साथ संयुक्त था.

महाराष्ट्र में अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कामरेड सुभाष काकुस्ते के नेतृत्व में नन्दूर्बाद जिले के साक्री तहसील में, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य कामरेड राजेन्द्र बी भाउके के नेतृत्व में अहमद नगर में प्रतिरोध सभाएं आयोजित की गयी. इसके अलावा नन्दूरबाड़, नवापुर, धूलिया में भी अखिल भारतीय किसान महासभा, सर्व श्रमिक शेतकारी पक्ष और सत्य शोधक कम्युनिस्ट पक्ष ने संयुक्त प्रतिरोध सभाओं का आयोजन किया. इन सभाओं को कामरेड बाला साहेब सुरुड़े, आर टी गाविद, करन सिंह कोकणी, पंजी गायकबाड़, असफाक कुरैशी और सुरेश मोरे ने भी संबोधित किया. किसानों आदिवासियों के बीच संघर्षरत प्रतिभा सिंदे के नेतृत्व वाले लोक मोर्चा ने दलोदा, जलगाँव  सहित कई स्थानों पर रोड जाम व प्रतिरोध मार्च आयोजित किए. राजू सेट्टी के नेतृत्व वाले सेताकारी संगठना ने राज्य के की जिलों में चक्का जाम किया. मेधा पाटकर के नेतृत्व वाले नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने भी कई स्थानों पर सड़क जाम व धरना आयोजित किए.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी किसान संगठनों ने प्रदर्शन किया. प्रदर्शन में किसान नेताओं के अलावा सीपीआई, सीटू, एसएफआई और एडवा के कार्यकर्ता भी भागीदारी किए. प्रदर्शन स्थल पर अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड हन्नान मौलाह, राष्ट्रीय सचिव कामरेड बीजू कृष्णन, अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कामरेड प्रेम सिंह गहलावत, राष्ट्रीय सचिव कामरेड पुरुषोत्तम शर्मा, सीटू के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड तपन सेन, एडवा की महासचिव मरियम धवाले, के. के. रागेश, विकास रंजन भट्टाचार्य व विनय विश्वाम सांसद राज्य सभा, मयूख विश्वास महासचिव एसएफआई, कामरेड दिनेश वैष्णव सीपीआई सहित दर्जनों लोग उपस्थित थे. त्रिपुरा के चारों जिलों में अखिल भारतीय किसान सभा और अखिल भारतीय किसान महासभा ने कई स्थानों पर संयुक्त प्रतिरोध मार्च आयोजित किए. नार्थ त्रिपुरा, अगरतला, उदयपुर नूर साउथ त्रिपुरा में कार्यक्रम किए किए. किसान महासभा की ओर से कामरेड मानिक पाल, कामरेड गोपाल राय, कामरेड सुबिरजीत, कामरेड देवनाथ और कामरेड बाबुल पाल ने किया. असम में कई संगठनों के प्रतिरोध कार्यक्रम आयोजित किए. किसान महासभा, एक्टू और आइसा ने गुवाहाटी, कलियाबर, बिहाली, रोहा और तिनसुखिया में प्रतिरोध कार्यक्रम आयोजित किए और केंद्र सरकार के पुतले फूंके. कार्यक्रमों का नेतृत्व कामरेड सुभाष सेन, डीदुमनी गोगोई, सुद्रतो तालुकदार, परिमल गौड, मिलासिनी देवी ने किया.

पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय किसान महासभा और अखिल भारतीय खेत एवं ग्रामीण मजदूर सभा ने ग्यारह जिलों के 25 स्थानों पर चक्का जाम व प्रतिरोध कार्यक्रम आयोजित किए. इनमें से कई स्थानों पर संयुक्त कार्यक्रम में भागीदारी रही. किसान महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कामरेड कार्तिक पाल और किसान स्वराज के राष्ट्रीय संयोजक अभिक शाह ने साउथ 24 परगना में चक्का जाम कार्यक्रम का नेतृत्व किया. वर्धमान में किसान महासभा के राज्य अध्यक्ष अन्नदा प्रसाद भट्टाचार्य, नदिया में सुबिमल सेन गुप्ता, हुगली में तपन बटब्बल, देवाशीष, बाँकुड़ा में बबलू बनर्जी, जलपाईगुडी में सामल भौमिक, दार्जिलिंग में पवित्र सिंह, मालदा में इब्राहिम सिंह, मुर्शीदाबाद में राजीव राय आदि नेताओं ने आन्दोलन की अगुआई की. मध्य प्रदेश के ग्वालियर व भिंड में किसान महासभा ने विरोध मार्च आयोजित किए. भिंड के विरोध मार्च का नेतृत्व किसान महासभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष कामरेड देवेन्द्र चौहान ने किया. झारखंड में भी कई स्थानों में किसान संगठन व वाम पार्टियां सड़कों पर उतरी. किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड पूरन महतो के नेतृत्व में गिरिडीह जिले में प्रतिरोध मार्च आयोजित किया गया.

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, मिर्जापुर, बलिया, लखीमपुर खीरी, जालौन, सोनभद्र, देवरिया, गोरखपुर, इलाहाबाद, फैजाबाद, रायबरेली, सीतापुर, पीलीभीत, मथुरा आदि जिलों में किसान महासभा ने प्रतिरोध मार्च व सड़क जाम कार्यक्रम आयोजित किये. पूरनपुर, पीलीभीत, खीरी, सीतापुर, शाहजहांपुर के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में किसान नेता वीएम सिंह के नेतृत्व वाले भारतीय किसान मजदूर संगठन ने सड़क जाम व धरना कार्यक्रमों का आयोजन किया. अयोध्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने किसान बिलों के विरोध में मार्च निकाला. बाद इहें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उत्तराखंड में नैनीताल, अल्मोड़ा और उधमसिंह नगर में किसान महासभा ने विरोध कार्यक्रम आयोजित किए. देहरादून, अल्मोड़ा में किसान सभा के नेतृत्व में धरना दिया गया जिनमें अन्य संगठनों ने भी भागीदारी की. उधमसिंह नगर में तराई किसान संगठन, भारतीय किसान यूनियन और अखिल भारतीय किसान सभा ने भी विरोध मार्च व सड़क जाम जैसे कार्यक्रम आयोजित किए.