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उद्यानीकरण से उत्तराखंड में रोजगार की हकीकत-2
June 3, 2020 • Delhi • लेख

उद्यानीकरण से रोजगार की हकीकत-2

चारु तिवारी

(उद्यानीकरण की हकीकत की पिछली पोस्ट में उद्यानों के कुछ ऐतिहासिक और मौजूदा हालात को समझने की कोशिश की थी। इसके दूसरे भाग में उद्यानों के प्रति सरकारों के रवैये पर एक नजर- चारु तिवारी)

उद्यानीकरण की दशा को समझने के लिये नैनीताल का रामगढ़ क्षेत्र काफी है। यहां अंग्रेजों ने बहुत उन्नत किस्म के सेब, आडू, पुलम, खुमानी और आलू की खेती शुरू की थी। अंग्रेजों ने 1872 में यहां बगीचा लगाया। चाय की खेती की शुरुआत भी की गई। इसके लिये चीन से चाय की खेती को सीखने के लिये लोग भी बुलाये। इस पूरे क्षेत्र को आज भी ‘चायना गार्डन’ के नाम से जाना जाता है। चीन से आये कुछ परिवार आज भी पुश्तों से यहां रहते हैं।

आजादी के बाद 1955 एलआइसी ने इस बगीचे को चलाया और ‘हार्टिको’ नाम से फूड प्रोसेसिंग यूनिट भी लगाई। बाद में इसे राजा राजगढ़ (कलकत्तिया सेठ) को बेच दिया गया। वर्ष 1958-64 में पैमाइश हुई तो इसके दो हिस्से हो गये। एक हिस्सा 395 एकड़ सरकारी उद्यान को मिला और 90 एकड़ सिंधिया परिवार को। बताते हैं कि उस समय इस बगीचे में फलों की 157 किस्में उगाई जा रही थी। रामगढ़ और मुक्तेश्वर के बीच एक ब्रिटिश परिवार का बगीचा था, जिसे ‘समर फोर्ट’ के नाम से जाना जाता था। इसे बाद में सिंघानिया (जेके ग्रुप) ने ले लिया।

एक और बगीचा था। इसके मालिक एक ब्रिटिश शिक्षाविद थे। जिसे ‘कुमाऊं औचट’ के नाम से जाना जाता है। इसे एक पंत परिवार ने खरीदा बाद में इसे बिड़ला गु्रप ने खरीद लिया। ब्रिटिश काल में उमापति ने गागर में एक बड़ा बगीचा बनाया। उमापति के नाम से ही इस जगह को उमागढ़ कहा गया। बाद में यह जोशी लोगों के पास रहा। रामगढ़ स्वीट सेब, सबसे बाद में पकने वाला हरा पिछौला, डेलिशियस, गोल्डन किंग, फैनी और जोनायन प्रजाति के सेब के लिये जाना जाता है। आडू की तोतापरी, हिल्स अर्ली, रेड जून जैसी प्रजातियां, खुमानी की मोकपार्क और पुलम की ग्रीन गोज जैसी प्रजातियों के उत्पादन ने इसे नई पहचान दिलाई।

हमारे साथी और पहाड़ के सरोकारों से नजदीक से जुड़े पृथ्वी सिंह बताते हैं- ‘रामगढ़ के बगीचे उत्तराखंड में फलोत्पादन को आजीविका का आधार बनाने का माॅडल हो सकते थे, लेकिन सरकारी नीतियों ने सबसे पहले इन्हें ही समाप्त किया। वे बताते हैं कि पहले यहां कृषकों ने बहुत उन्नत किस्म के आडू का उत्पादन किया। एक तरह से आडू ने इस क्षेत्र को नई पहचान दिलाई। पुलम, खुमानी, टमाटर और आलू की उपज ने कृषकों को आत्मनिर्भर बनाया। लेकिन आज हालात बदल गये हैं। हार्टिकल्चर विभाग ने वर्षों से यहां अपना कोई रिसर्च नहीं किया है। फलों और सब्जियों में नई बीमारियां आ गई हैं। पुराने फलदार पेड़ों की जगह नये पेड़ नहीं लगे हैं। आडू में पत्ती मरोड़ कीट (पसीना) जैसी बीमारी आ गई है। खुमानी अचानक सूख जा रही है। आडूू का एक पेड़ मात्र पांच किलो आडू दे पा रहा है। हालांकि स्थानीय किसानों ने अपने बल पर अभी आडू को बचाये रखा है।

पहले जब यातायात के साधन नहीं थे तब भी रामगढ़ का आडू मुंबई के बाजार में जाता था, आज हल्द्वानी तक में उसे बाजार नहीं मिल पा रहा है। उसके ऊपर भारी पैकेजिंग का खर्च आता है। बड़ी मात्रा में होने वाला आलू समाप्ति की ओर है। यहां पहले सरकारी आलू फार्म था, जिसमें प्रमाणिक बीज किसानों को दिया जाता था, लेकिन इसके बंद होने के बाद प्रमाणिक बीज के अभाव में आलू की फसल पर प्रभाव पड़ा है। आलू फार्म को फिल्म सिटी बनाने के नाम पर लीज पर देने की साजिश की गई। अब गागर वाला क्षेत्र होटल, रिजार्ट और फ्लैट्स से भर गया है।’ फलोत्पादन और कृषि से लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की बात करने वाली सरकारों के दावे कितने खोखले होते हैं इसे समझने के लिये आलू की खेती को ही लें।

राज्य बनने से पहले राज्य के प्रत्येक जनपद में दो-तीन आलू बीज उत्पादन फार्म थे। टिहरी के धनोल्टी और कांणाताल, उत्तरकाशी के द्वारी और रैथल, पौड़ी में भरसार और खपरोली, रुद्रप्रयाग में चिरबटिया और घमतोली, चमोली में परसारी, कोटी और रामणी, पिथौरागढ़ के मुनस्यारी और धारचूला, अल्मोड़ा में दूनागिरि और जागेश्वर, नैनीताल के गागर और रामगढ़ आदि में ये फार्म स्थापित किये गये थे। इन फार्मों में हिमाचल के कुफरी या अन्य क्षेत्रों से आलू का फाउंडेशन बीज मंगाकर प्रमाणिक बीज तैयार किया जाता था। मांग के अनुसार स्थानीय कास्तकारों को वितरित किया जाता था। प्रमाणिक बीज से कास्तकार 16 से 20 गुना अधिक उपज उगा सकते थे। पुरानी फसल से बनाये आलू के बीज से उत्पादन मात्र तीन से चार गुना हो पाती है। अब प्रमाणिक बीज न मिल पाने से किसानों का आलू की खेती से भी मोहभंग हो रहा है। यह अलग बात है कि पिथौरागढ़ के मुनस्यारी, धारचूला, मदकोट, बौना, गांधीनगर, क्वीरी, सरमोली, गोल्फा, नितर्ोली, गिरगांव आदि 40 गांवों में सहकारिता के आधार पर प्रमाणिक बीज से अच्छा उत्पादन हो रहा है।

पर्वतीय क्षेत्र में फलोत्पादन और इस आर्थिकी से जोड़ने के लिये बना उद्यान विभाग हमेशा अविश्वसनीय आंकड़ों के सहारे चलता रहा है। अविभाजित उत्तर प्रदेश में 1988 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी ने उद्यान विभाग को बेहतर बनाने के लिये ‘बक्शी एवं पटनायक कमेटी’ बनाई थी। इस कमेटी ने बताया कि उद्यान विभाग के आंकड़े 87 प्रतिशत गलत हैं। विभाग द्वारा दिये गये मात्र 13 फीसदी आंकड़े ही सही हैं। तब से लेकर आज तक एक बड़ा दौर गुजर चुका है। पिछले सालों में सरकार ने एक ‘पलायन आयोग’ गठित किया है। उसकी रिपोर्ट भी कहती है कि उद्यान विभाग के आंकड़े अविश्वसनीय हैं। आयोग ने पौड़ी जनपद के वर्ष 2018-19 के आंकड़ों का हवाला देते हुये बताया है कि विभाग ने उद्यानों का क्षेत्रफल 20301 हैक्टेयर दर्शाया है, जबकि सर्वे में पाया गया कि यह मात्र 4042 हैक्टेयर ही है। यही स्थिति लगभग हर जिले की है। उद्यान और खाद्य प्रसंस्करण निदेशालय की 2018-19 की रिपोर्ट बताती है कि राज्य में 2095602 हैक्टेयर यानि लगभग तीन लाख हैक्टेयर जमीन पर फल, सब्जी, आलू, मसालों और पुष्प का उत्पादन हो रहा है।

इन आंकडों की विश्वसनीयता इसलिये भी संदेह के घेरे में है कि उत्तराखंड की कुल कृषि योग्य भूमि का रकवा मात्र 7 लाख हैक्टेयर बचा है। इसमें भी एक बड़ी जमीन ऐसी है जिसमें कुछ हो नहीं रहा है। जिन जगहों में कभी फल और सब्जियां होती थी उनमें नये रिजार्ट और कोठियां उग आई हैं। निदेशालय का यह आंकड़ा भी चौंकाने वाला है कि वर्ष 2018-19 में राज्य में फलों का उत्पादन 664655.41 मैटिक टन हुआ। विभाग बताता है कि सब्जी का उत्पादन 630109.15 मैटिक टन हुआ। आलू का उत्पादन 363797.56 मैटिक टन, मसाला 93624.56 मैटिक टन और पुष्प का उत्पादन 3017 मैटिक टन हुआ। और इसी आधार पर उन्होंने यह भी तय कर दिया कि देश में कश्मीर के बाद उत्तराखंड फल उत्पादन का दूसरा बड़ा राज्य है। लीची उत्पादन में देश छठा राज्य है।

अगर उद्यान विभाग के ये आंकडे़ सच हैं तो मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत जी को पलायन रोकने या रिवर्स पलायन के लिये कुछ नया करने की जरूरत नहीं है। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने ‘मन की बात’ में कपकोट के मनार गांव का जिक्र करते हुये कहा था कि वहां के युवाओं ने मडुवे और चैलाई पर इतना अच्छा काम किया कि वह भारत के ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोकने की नजीर बन गया है। प्रधानमंत्री ने आंकड़ों का हवाला देते हुये बताया कि इन ग्रामीणों ने एक सोसाइटी के माध्यम से मडुवे और चौलाई के बिस्कुट बनाकर प्रतिवर्ष 10 से 15 लाख तक की कमाई की है। उन्होंने यह भी बताया कि इस काम से क्षेत्र के लगभग 900 परिवारों का रोजगार मिला हुआ है।

अगर प्रधानमंत्री जी के इस आंकड़े को सच माना जाये तो हर परिवार के हिस्से में हर साल 1666 (एक हजार छह सौ छियासठ रुपये) और एक महीने में 138 (एक सौ अड़तीस रुपये) आता है। युवाओं के प्रयास की सराहना की जानी चाहिये, लेकिन उनके काम को अपनी राजनीति चमकाने के लिये इस्तेमाल करने की बजाय सही मार्गदर्शन किया जाना चाहिये। अगर इस तरह के आंकड़ों से पलायन रुकता है तब तो ठीक है, नहीं तो उद्यान विभाग अपनी पीठ थपथपाने के लिये जो भारी-भरकम आंकड़े दे रहा है उसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिये। अगर ये आंकड़े ठीक हैं तो राज्य पहले से ही आत्मनिर्भर है। इन आंकड़ों की पोल-पट्टी विभाग खुद ही खोल देता है।

उद्यान विभाग और सरकार की नीतियों से लोगों को जोड़ने और सरकार के राजस्व प्राप्त करने के दावे कितने खोखले हैं, इन्हें जानने के लिये उन फूड प्रोसेसिंग यूनिटों के बारे में भी जानना जरूरी है, जो सरकार को अच्छी आय देने के साथ लोगों को रोजगार और किसानों को प्रोत्साहित कर सकते थे। राज्य बनने से पहले पूरे राज्य जो यूनिटें लगी थी वे एक-एक कर बंद होने लगी। रामगढ़ में आजादी से पहले बने ‘हार्टिको’ को बंद किया गया। सत्तर के दशक में सहकारिता के आधार पर एग्रो द्वारा फूड प्रोसंसिंग यूनिट लगाई गई जो सरकार ने 1994 में बंद कर दी। अस्सी के दशक में अल्मोड़ा के मटेला में करोड़ों की राशि खर्च कर कोल्ड स्टोरेज बना। फल और सब्जियों के अभाव में इसे बंद कर दिया गया। राज्य बनने के बाद इसे दक्षिण भारत के एक व्यक्ति को लीज पर दिया गया। वह कई किसानों को चपत लगाकर भाग गया।

रानीखेत के चौबटिया गार्डन की एपल जूस की प्रोसेसिंग यूनिट बंद है। अस्सी के दशक में एग्रो ने कर्णप्रयाग में फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाई थी जो बंद है। रुद्रप्रयाग के तिलवाड़ा में लगी फूड प्रोसेसिंग यूनिट मरणासन्न हालत में हैं। उत्तरकाशी और चमोली के कोल्ड स्टोरेज बंद पड़े हैं। बहुत सारे लोगों ने अपने प्रयासों से जरूर इस दिशा में कुछ काम किया है। इनमें भी जिन लोगों ने छोटी पूंजी और बैंक से ऋण लेकर अपना काम शुरू किया है वे सही बाजार न मिल पाने के कारण परेशान हैं। उन्हें सरकार की ओर से न तो प्रोत्साहित किया जाता है और न ही किसी तरह की मदद। हां, अगर कोई यूनिट सही चल रही है तो सरकार उसे अपना बताकर प्रचार जरूर कर देती है।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत बार-बार दोहरा रहे हैं कि वे लोगों को खेती और फलोत्पादन से रोजगार देंगे। यह बहुत सतही बातें हैं। उद्यानीकरण की नीति एक रात में लोगों को रोजगार देने वाली नहीं है। यह पूरे एक दशक का रोडपैम है। जो सरकारें बनी-बनाई उद्यानीकरण के दुनिया के सबसे अच्छे माॅडल को समाप्त कर देती हैं वे इस क्षेत्र में लोगों को रोजगार देने की बात कर रही है समझ से परे है। यह वही चैबटिया गार्डन है, जिसके सेब और प्रशिक्षण ने हिमाचल को ‘एप्पल स्टेट’ बनाया। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों ने भी चैबटिया के शोध से ही अपने यहां बागवानी और हर्बल को स्थापित किया। सरकार ने साजिशन उसी शोध केन्द्र को समाप्त कर दिया। हां, सरकार की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने चौबटिया गार्डन का नाम ‘पं. दीनदयाल उपाध्याय उद्यान’ रख दिया है।

आज अगर हम उत्तरकाशी और सीमान्त के कुछ क्षेत्रों के लोगों के परंपरागत बागवानी को छोड़ दें तो पूरे राज्य में कहीं भी बागवानी से लोगों को जोड़ने की कोशिश नहीं हुई है। उत्तरकाशी का एक बड़ा हिस्सा जो परंपरागत रूप से बागवानी और सब्जी का उत्पादन करता रहा है, वह भी बीज, तकनीक और मार्केटिंग की सारी मदद हिमाचल से ले रहा है। इन क्षेत्रों ने अभी अपने पुराने बीज और फलों की पुरानी किस्मों को बचाये रखा है। बागवानी, मशरूम और सब्जी उत्पादन के बहुत सारे माॅडल उत्तराखंड में समय-समय पर बनते रहे हैं। लोगों ने अपने प्रयासों से बगीचे स्थापित किये हैं। कई लोगों ने बड़ी जमीनें खरीदकर तो कई ने लीज पर लेकर बड़े बगीचे खड़े किये हैं। उन्होंने अच्छा उत्पादन भी किया है। सरकार उन्हें पुरस्कृत भी करती है और उन्हें अपना ब्रांड एम्बेसडर भी बनाती है। सरकार उनके माॅडल को दिखाकर बताती है कि देखो पहाड़ में कुछ भी हो सकता है। सरकार इस बहाने यह भी साबित कर देती है कि गांव के लोग कुछ करना नहीं चाहते इसलिये खेती बंजर हो रही है।

अपने प्रयासों से पिछले पांच साल से फलोत्पादन पर काम कर रहे हमारे मित्र गोपाल उप्रेती इसे बहुत निराशाजनक नहीं मानते हैं। उनका कहना है, ‘जब हमने अल्मोड़ा जनपद के रीची-बिल्लेख में नये तरीके और फलोत्पादन पर काम किया तो उसके बहुत सकारात्मक परिणाम भी सामने आये हैं। बहुत सारे किसान खेती और जैविक खेती के लिये उत्साहित हुये हैं। पिछले दिनों जब हमारे बगीचे में उगा जैविक धनिया विश्व रिकार्ड के लिये नामित होने लगा तो लोगों में एक तरह की प्रतिस्पर्धा शुरू हुई है। जब हमने सेब के बगीचे की शुरुआत की तो उस समय निश्चित रूप से कई तरह की कठिनाइयां लग रही थी।

जब हमारा प्रयास सफल हुआ तो पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इसे सराहा और ‘उत्तराखंड एप्पल मिशन’ की घोषणा की। इसका लाभ बहुत सारे लोग उठा रहे हैं। अभी राज्य में पांच बड़े बगीचे इसी मिशन के तहत बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। पौड़ी में भी सेब को बढ़ाने के काम की अच्छी खबरें आ रही हैं। एक अच्छा संकेत यह भी है कि बड़ी संख्या में लोग ‘उत्तराखंड एप्पल मिशन’ के साथ जुड़कर काम करने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं।’ कितना आश्चर्यजनक है कि राज्य में कृषि और बागवानी को बढ़ावा देने के लिये राज्य में विश्व स्तरीय संस्थान हैं। पं. गोविन्दबल्लभ पंत कृषि एवं प्रोद्यौगिकी विश्वविद्यालय जो दुनिया के प्रमुख शोध केन्द्रों में से एक है। उसकी सोना उगलने वाली हजारों हैक्टेयर जमीन अब उद्योगपतियों के कब्जे में है। अपनी स्थापना के साठ सालों में वह पहाड़ की कृषि और बागवानी के लिये कोई ऐसा शोध नहीं कर पाई जो यहां के किसानों को कृषि के रोजगार से जोड़ सके। इस विश्वविद्यालय के शोध में पेड़, पौंधे, बनस्पतियां होंगी, लेकिन उनके शोध के केन्द्र में किसान कभी नहीं रहा। हो सकता है सरकार और नीति-नियंता उनके शोधों को नीतियों में नहीं बदल पाये हों, जिस कारण किसान अपनी खेती को अनुत्पादक समझ कर छोड़ते गये। जहां बड़े-बड़े सेरे हैं वहां की जमीनों का बंजर होना इस बात को दर्शाता है कि किसानों को अपनी खेती से आत्मनिर्भर होने पर भरोसा नहीं है।

विवेकानन्द कृषि अनुसंधान संस्थान, कृषि प्रसार केन्द्र, कृषि विज्ञान केन्द्र, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के प्रोजेक्ट, विश्व बैंक की योजनायें, वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली औद्यानिकी विश्वविद्यालय, राज्य सरकार का कृषि विभाग, उद्यान विभाग, कुमाऊं विश्वविद्यालय, गढ़वाल विश्वविद्यालय के अलावा कई निजी विश्वविद्यालय भी कृषि और बागवानी के लिये काम कर रहे हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं की तो एक बड़ी जमात है जो कृषि, बागवानी, पर्यावरण, पशुपालन जैसे विषयों पर ही काम करती है। जितना पैसा सरकारें खर्च करती हैं उतना ही एनजीओ भी करते हैं। लेकिन उसे या तो जमीन खा जाती है या आकाश निगल जाता है। इतना सब कुछ होने के बावजूद सरकार जनता के अनुरूप नीतियां बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है।

संवेदनहीन राजनेता, पहाड़ को हमेशा प्रयोगशाला की तरह देखने वाली एक जमात, भ्रष्ट नौकरशाही और एनजीओ का गठजोड़ सरकारी योजनाओं की बंदरबांट में शामिल है। वह नीतिगत बातों को करने की बजाय सारा दोष जनता के सिर मढ़ देने के रास्ते तलाशते रहते है। उसमें वह कामयाब भी हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत कहते हैं कि वे फलोत्पादन और कृषि से लोगों को रोजगार से जोड़ेंगे दूसरी तरफ उनकी जमीनों को बड़ी पूंजीपतियों के हवाले करने की नीतियों पर काम कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘कांटेक्ट फार्मिंग’ की नीति है। सरकार ने कहा है कि लोग अपनी बंजर खेती को किसी बड़ी कंपनी को ‘कान्टेक्ट फार्मिंग’ के तहत लीज पर देकर उससे पैसा कमा सकते हैं। सरकार ने पूंजीपतियों को जमीन सौंपने का रास्ता तो निकाल लिया, लेकिन वह किसान के लिये ऐसी नीति नहीं बना पा रही है, जिससे ग्रामीण सामूहिक खेती कर उत्पादित चीजों को बड़ी कंपनियों के लिये तैयार करें। इससे किसान की खेती भी पूंजीपति के हाथ में जाने से बचेगी और उसे अपनी खेती से ज्यादा आर्थिक लाभ होगा।

(संदर्भः 1. कुमाऊं का इतिहास, बद्रीदत्त पांडे। 2. ‘शोधगंगा’ में प्रकाशित ‘उत्तराखंड में उद्यानीकरण का इतिहास’ अध्याय-5, शोधकर्ता का नाम नहीं दिया है। 3. शरदोत्सव रानीखेत से प्रकाशित स्मारिका-1993 में रामलाल शाह का लेख- ‘ए शाॅर्ट हिस्ट्री आॅफ गवनर्मेंट गार्डन, चैबटिया। 4. निदेशालय, उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण, उत्तराखंड, उद्यान भवन चौबटिया। 5. डा. राजेन्द्र कुकसाल, वरिष्ठ सलाहकार, कृषि/उद्यान एकीकृत सहयोग परियोजना (ILSP) एवं सेवा इंटरनेशनल, उत्तराखंड से लगातार लंबी बातचीत। 6. रामगढ़ से पृथ्वीसिंह, भीमताल से संजीव भगत और रानीखेत से गोपाल उप्रेती की फीडबैक। (अगली किस्त हर्बल, जैविक खेती और आयुष की हकीकत पर)