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वामपंथ का मजबूत उभार ही दे सकता है दक्षिणपंथी वर्चस्व को चुनौती
July 23, 2020 • Delhi • लेख

*राजस्थान में राजनीतिक संकट : भारतीय लोकतंत्र के लिए संकेत*

राजस्थान में राज्य सरकार के भविष्य को लेकर अस्थिरता जारी है. इस तूफान को सरकार पार कर पाएगी या नहीं इसके लिए राजस्थान उच्च न्यायालय और राज्य विधानसभा के घटनाक्रम पर हमें नजर बनाए रखनी होगी. इस संकट के तात्कालिक परिणाम से ज्यादा चिंताजनक यह है कि सरकार को अस्थिर करने का यह दांव, महामारी के बीच में चला जा रहा है जबकि सारा ध्यान राज्य और उसकी जनता को कोरोना के कहर से बचाने पर होना चाहिए था.

मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन ने प्रारम्भिक दौर में कोरोना से निपटने में भारत को बुरी तरह से प्रभावित किया था और राजस्थान में तो उठापटक का खेल ऐसे वक्त में खेला जा रहा जबकि स्थिति अत्यंत गंभीर हो चली है, भारत में कोरोना के आंकड़े निरंतर बढ़ रहे हैं और राजस्थान सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में से एक है.

पहले जो मध्य प्रदेश में हुआ और अब जो राजस्थान में हो रहा है, वो ऐसी अनिष्टकारी प्रवृत्ति है जो मोदीराज की स्वाभाविक पहचान बनती जा रही है. भाजपा शासित केंद्र ने राज्य-दर-राज्य विपक्ष की सरकारों को पलटने की आदत सी बना ली है और इस खेल में वह सिद्ध हस्त हो गया है. यह जिस तरह से लगातार किया जा रहा है, वह मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश है कि गैर भाजपा, गैर राजग सरकार चुनने का कोई अर्थ नहीं।

उत्तर पूर्व के छोटे राज्यों और गोवा जैसे राज्यों में यह दांव आजमाने के बाद भाजपा बिहार, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सरकार पलटने या हड़पने की दिशा में बढ़ी. झारखंड में भी सरकार को अस्थिर करने की कोशिशों की सूचना है. बिहार में भाजपा ने सत्तासीन मुख्यमंत्री नितीश कुमार से सांठगांठ करके जनता के भाजपा विरोधी जनादेश को हड़प लिया, मध्य प्रदेश में उसने ज्योतिरादित्य सिंधिया को जाल में फंसाया और राजस्थान में वह पूर्व उपमुख्यमंत्री और कॉंग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को शीशे में उतारने की फिराक में है.

भाजपा ने विधायक खरीद फरोख्त (हॉर्स ट्रेडिंग) को इस कदर सामान्य बना दिया है कि चुनी हुई विपक्षी सरकारों पर गाहे-बगाहे धावा बोलने, थोक में दल-बदल करवाने और अकूत पैसे के बल पर बोली लगा विपक्षी विधायकों पर कब्जा जमाने के उस के कुप्रयासों पर कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा है. ये शहंशाह के आम करतब समझे जा रहे हैं और अपेक्षा है कि भाजपाई साम्राज्य के निरंतर विस्तार पर हम चमत्कृत हों!

राजस्थान के संदर्भ में चल रही पूरी बहस को देखिये. उसे मात्र सचिन पायलट की बगावत या अपने विधायकों को न समेट पाने में कॉंग्रेस की विफलता या हद से हद नेहरू-गांधी परिवार के पारिवारिक नेतृत्व को चुनौती देने वाले संभावित दावेदारों से पार्टी को निष्कंटक करने के दांव के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. टेपों और विधायकों की स्वीकारोक्तियों से लेकर पायलट की कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए दो बड़े, भाजपाई झुकाव वाले वकीलों की नियुक्ति तक, इस मामले में भाजपा की शिरकत स्पष्ट है. और अगर पायलट की उलटफेर करने की कोशिश कामयाब हो गयी तो बनने वाली सरकार प्रभावी तौर पर भाजपाई सरकार होगी, अगर भाजपा नेतृत्व वाली न हुई तो भाजपा समर्थित होगी.

फिर भी वर्चस्वशाली मीडिया में, इस राष्ट्रीय संकट की घड़ी में सत्ता के लिए भाजपाई नंगई के बारे में कहीं कोई चर्चा नहीं है. केंद्र में नरेंद्र मोदी के उभार के साथ, राजनीति में बड़े पैसे की भूमिका भी, भारत में नयी ऊंचाइयों पर पहुँच गयी है.

बड़े कॉरपोरेट घरानों के मोदी सरकार के प्रति सार्वजनिक आत्मीयता प्रदर्शन ने भी सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं. लेकिन फिर भी राजनीति में बड़े पैसे का प्रवाह पूरी तरह से अपारदर्शी,अज्ञात और जवाबदेही विहीन बना हुआ है. भारत निर्वाचन आयोग ने भी इलेक्टोरल बॉन्ड और वित्त अधिनियम, आयकर अधिनियम और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में किए गए बदलावों पर चिंता जाहिर की, जिनके चलते विदेशों से मिलने वाले पैसे का भी स्रोत अज्ञात रहेगा क्यूंकि इन बॉन्डों के जरिये हासिल चंदे की जानकारी पार्टियों को सार्वजनिक नहीं करनी होती है. यह गौरतलब है कि अब तक इलेक्टोरल बॉन्डों से हासिल कुल चंदे में से 95 प्रतिशत भाजपा को मिला है.

कोविड 19 महामारी के फैलने के साथ ही मोदी सरकार ने पीएम-केयर फंड की शुरुआत की और इसे सार्वजनिक ऑडिट और जवाबदेही के दायरे से बाहर कर दिया. यह कतई हैरत की बात नहीं होगी, अगर यह पता चले कि कोरोना राहत के नाम पर एकत्रित धन विधायक खरीदने और राजस्थान सरकार को अस्थिर करने के लिए खर्च किया जा रहा था.

एक अन्य विचारणीय प्रश्न यह है कि कॉंग्रेस के नेताओं और विधायकों के लिए भाजपा में जाना इतना आसान और सहज कैसे है ? मीडिया में सारी बहस कॉंग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की कमी, नेहरू-गांधी परिवार का नियंत्रण और युवा नेताओं के प्रदर्शन को प्रोत्साहन के अभाव के इर्द-गिर्द घूमती रहती है. आरएसएस के कठोर एवं हावी नियंत्रण, मोदी-शाह द्वय का निरंतर बढ़ता वर्चस्व और बाकी नेतृत्व का हाशिये पर जाना तो दर्शाता है कि भाजपा इन पैमानों पर कॉंग्रेस से बेहतर विकल्प नहीं है.

भाजपा अब भी कॉंग्रेस को वंशवाद के नाम पर घेरती रहती है. पर अपने यहाँ जिस नेतृत्व को वह पनपा रही है या कॉंग्रेस से जिनको अपने यहाँ ला रही है, वे सब तो वंशवाद के ही उत्पाद हैं. उसने तो नेहरू-गांधी वंश के भी एक अंश को संजय गांधी विरासत के रूप में अपने यहाँ समाहित किया हुआ है. स्व घोषित “पार्टी विद डिफ़्रेंस” ने कॉंग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों के दल बदलुओं के लिए स्वयं को अत्यधिक आवभगत वाले केंद्र में तब्दील कर दिया है.

हमें इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि भाजपा के प्रभुत्वशाली राजनीतिक ताकत के रूप में उभार, निरंतर बढ़ते दक्षिणपंथी रुझान और संघ-भाजपा के हिन्दुत्व या हिंदू श्रेष्ठता वाले राष्ट्रवाद के 'सामान्यीकरण' के साथ, ऐतिहासिक रूप से भाजपा और कॉंग्रेस के बीच जो भी राजनीतिक अवरोध थे, निरर्थक न भी कहें तो भी यह कहा जा सकता है कि वे काफी छिद्रयुक्त और अप्रभावी हो चले हैं.

राजस्थान संकट के नतीजों से इतर, दो निष्कर्ष स्पष्ट हैं. दसवीं अनुसूची का दल बदल विरोधी कानून, दल बदल रोकने में अप्रभावी सिद्ध हुआ है. हमने वे बहुत सारे तरीके देखें हैं, जिनके जरिये विधायक या सांसद, दल-बदल विरोधी कानून से खिलवाड़ करते हैं. यह कानून दल बदल को पार्टी के प्रति निष्ठा के उल्लंघन के तौर पर देखता है. दल-बदल को चुने गए प्रतिनिधि द्वारा मतदाताओं के साथ किए गए करार को तोड़ने के रूप में देखा जाना चाहिए. इसलिए कानून में न केवल सभी दल-बदलुओं के लिए इस्तीफा देना अनिवार्य होना चाहिए बल्कि उन्हें छह साल तक चुनाव लड़ने और किसी सार्वजनिक पद को धारण करने से अयोग्य करार दिया जाना चाहिए.

दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष वैचारिक है. अगर भारतीय लोकतंत्र को एक-पार्टी तंत्र में तब्दील होने से बचाना है तो वैचारिक-राजनीतिक मुक़ाबले को मजबूत किया जाना चाहिए और बढ़ते दक्षिणपंथी झुकाव और वर्चस्व को चुनौती केवल मजबूत वामपंथी उभार द्वारा ही दी जा सकती है. भारतीय जनता के बड़े हिस्से के जीवन और स्वतंत्रता पर बढ़ता हमला, निश्चित ही नयी संभावनाओं को जन्म दे रहा है, जिनमें लोकतंत्र के रक्षक के रूप में वामपंथ का पुर्नउभार हो सकता है. वामपंथ को खुद को इस चुनौती के योग्य सिद्ध करना होगा.

(एमएल अपडेट का संपादकीय)